ईर्ष्या, अहंकार और लोभ से जन्म लेता है क्रोध: जीवन में संतोष और सकारात्मक सोच का महत्व
मानव व्यवहार और मानसिक विकारों के विश्लेषण में एक गहरा सत्य यह है कि क्रोध कभी अकेला नहीं आता। हमारे मन में यदि किसी के प्रति ईर्ष्या नहीं है, तो उसके प्रति क्रोध का जन्म लेना लगभग असंभव है। वास्तव में, क्रोध की उत्पत्ति तभी होती है जब मन के भीतर ईर्ष्या की अग्नि प्रज्वलित हो जाती है। मनुष्य के भीतर क्रोध पनपने के तीन मुख्य आधार स्तंभ हैं: पहला अहंकार, दूसरा मन का लोभ और उसके पूरा न होने पर उपजा असंतोष, और तीसरा चित्त में व्याप्त ईर्ष्या।
समृद्धि बुरी नहीं, ईर्ष्या घातक है जीवन में सुंदरता, धन, वैभव, यश और समृद्धि प्राप्त करना कतई बुरा नहीं है। ये जीवन को सुगम और सेवाभावी बनाने के साधन हैं। दोष इन वस्तुओं में नहीं, बल्कि दूसरे की संपन्नता को देखकर पैदा होने वाली हीन भावना या जलन में है। धन कमाना या सुख-सुविधाओं के लिए पुरुषार्थ करना एक सकारात्मक प्रयास है, लेकिन जब अपनी कमी खलने लगे और दूसरे की अधिकता चुभने लगे, तो यहीं से मानसिक पतन शुरू होता है। धन का होना आपको अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति और अभावग्रस्तों की सहायता कर पुण्य कमाने का अवसर देता है, लेकिन धन का न होना आपको ईर्ष्यालु बनने का लाइसेंस नहीं देता।
प्रभु की न्याय व्यवस्था पर विश्वास अध्यात्म हमें सिखाता है कि व्यक्ति को जीवन में वही प्राप्त होता है, जिसके लिए उसने वर्तमान में पुरुषार्थ किया है और जो उसके पूर्व कर्मों के आधार पर उसके 'प्रारब्ध' में अंकित है। यदि ईश्वर ने किसी अन्य को आपसे अधिक वैभव दिया है, तो वह उसके अपने कर्मों का प्रतिफल है। ऐसे में दूसरे की समृद्धि पर उंगली उठाना या उससे द्वेष करना, प्रत्यक्ष रूप से ईश्वर की न्याय व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करने जैसा है, जो एक महापाप की श्रेणी में आता है।
ये भी पढ़ें शीतला अष्टमी 2026 कब है:- जानिए बासोड़ा पूजा की सही तिथि मुहूर्त और शीतला माता व्रत का महत्वअसंतोष के पागलपन से बचें ईर्ष्या व्यक्ति को पागलपन की सीमा तक ले जा सकती है, जहाँ वह अपनी खुशियों को भूलकर दूसरों के दुख की कामना करने लगता है। सच्चा सुख इस बोध में है कि हम अपने हिस्से का कर्म पूरी ईमानदारी से करें और जो प्राप्त हो, उसमें संतोष रखें। दूसरों के उत्कर्ष को देखकर ईर्ष्या के बजाय प्रेरणा लेना ही श्रेष्कर है। यदि मन ईर्ष्या से मुक्त हो जाए, तो क्रोध और असंतोष स्वतः ही विदा ले लेते हैं।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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