स्पेस में जाने वाले पहले एस्ट्रोनॉट यूरी गागरिन, जब कैप्सूल छोड़ स्पेसक्राफ्ट से लगाई थी 'छलांग'
नई दिल्ली। 12 अप्रैल 1961 का वह ऐतिहासिक दिन जब सोवियत संघ के कॉस्मोनॉट यूरी गागरिन स्पेस में जाने वाले पहले इंसान बने। उनकी उड़ान ने मानव इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा। "पोयेखाली!!" (चलो चलें) कहते हुए उन्होंने कजाकिस्तान के बैकोनूर कॉस्मोड्रोम से वोस्तोक 1 स्पेसक्राफ्ट में सवार होकर उड़ान भरी थी। क्या अंतरिक्ष में इंसान जीवित रह सकता है? स्पेसक्राफ्ट से यात्रा संभव है? क्या पृथ्वी से संपर्क मजबूत और प्रभावी रहेगा? क्या सुरक्षित वापसी हो पाएगी? इन सवालों के जवाब लेने के लिए अंतरिक्ष जाने वाले पहले इंसान यूरी गागरिन की आज जयंती है।
उन्होंने 12 अप्रैल 1961 को ये सब संभव साबित किया। यह मिशन पृथ्वी की एक पूरी परिक्रमा पूरी करने वाला पहला मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियान था। वोस्तोक 1 ने 27,400 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पृथ्वी का चक्कर लगाया। पूरी उड़ान लगभग 108 मिनट चली। वापसी के दौरान स्पेसक्राफ्ट को कंप्यूटर से नियंत्रित किया गया था। हालांकि, इस मिशन का सबसे रोमांचक और चुनौतीपूर्ण हिस्सा इसकी लैंडिंग थी। तत्कालीन सोवियत इंजीनियरों के पास कैप्सूल की लैंडिंग के लिए पर्याप्त 'ब्रेकिंग सिस्टम' उपलब्ध नहीं था, जिससे कैप्सूल की तेज रफ्तार जमीन पर टकराते समय जानलेवा साबित हो सकती थी।
इसी जोखिम को देखते हुए यह योजना बनाई गई कि गागरिन कैप्सूल के भीतर रहने के बजाय पैराशूट के जरिए सुरक्षित नीचे उतरेंगे। जब वोस्तोक-1 पृथ्वी की सतह से लगभग 23 हजार फीट की ऊंचाई पर पहुंचा, तब क्राफ्ट का 'हैच' खुला और गागरिन इजेक्शन सीट के जरिए बाहर निकल गए। उनका पैराशूट समय पर खुल गया और करीब 10 मिनट की 'डिसेंट' (नीचे आने की प्रक्रिया) के बाद वे सुरक्षित जमीन पर उतरने में सफल रहे। लैंडिंग की इस विशिष्ट तकनीक को सोवियत अधिकारियों ने शुरुआत में दुनिया से छिपाए रखा। अंतरराष्ट्रीय एविएशन फेडरेशन (एफएआई) के नियमों के अनुसार, विश्व रिकॉर्ड के लिए पायलट को क्राफ्ट के साथ ही लैंड करना जरूरी था। यही कारण था कि शुरुआती रिपोर्टों में दावा किया गया कि गागरिन कैप्सूल के साथ ही उतरे थे। वर्षों बाद यह तथ्य सामने आया कि सुरक्षा कारणों से उन्होंने पैराशूट का सहारा लिया था।
यह फैसला सुरक्षा के लिए लिया गया था, क्योंकि कैप्सूल की लैंडिंग बहुत तेज और उछाल वाली थी। इस सफल उड़ान ने उन्हें सोवियत संघ का नेशनल हीरो बना दिया। वह अंतरराष्ट्रीय सेलिब्रिटी बन गए। बाद में वह कॉस्मोनॉट ट्रेनिंग सेंटर के डिप्टी डायरेक्टर भी बने और नए कॉस्मोनॉट्स को ट्रेनिंग दी। उन्होंने एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में थीसिस भी पूरी की। हालांकि, सोवियत अधिकारी उन्हें दोबारा स्पेस में भेजने से हिचकिचाते रहे, क्योंकि उन्हें खोने का डर था। दुर्भाग्य से 27 मार्च 1968 को 34 साल की उम्र में गागरिन एक एमआईजी-15यूटीआई जेट ट्रेनिंग फ्लाइट के दौरान क्रैश में मारे गए। उनकी मौत ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया। आज भी गागरिन की विरासत जीवित है। कॉस्मोनॉट ट्रेनिंग सेंटर का नाम गागरिन कॉस्मोनॉट ट्रेनिंग सेंटर रखा गया। बैकोनूर का लॉन्च पैड 'गागरिन स्टार्ट' कहलाता है, जहां से आज भी आईएसएस मिशन लॉन्च होते हैं। ह्यूस्टन में उनकी और अमेरिकी एस्ट्रोनॉट जॉन ग्लेन की प्रतिमाएं साथ में स्थित है।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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