जीवन की संध्या में परमात्मा भक्ति और कर्मशीलता का महत्व

सांझ होते ही पशु-पक्षी अपने-अपने घोंसलों की ओर लौट जाते हैं। किन्तु खेद की बात है कि मनुष्य अपनी जीवन यात्रा का लंबा समय व्यर्थ भोगों और सांसारिक इच्छाओं में गंवा देता है। जीवन की संध्या अर्थात वृद्धावस्था आते-आते भी बहुत से लोग अपने वास्तविक घर अर्थात परमात्मा की ओर नहीं लौटते। यही कारण है कि वे जन्म-मरण के चक्र में फंसे रहते हैं।
परमात्मा की भक्ति का यह अर्थ कतई नहीं कि आप अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों से मुंह मोड़कर बैठ जाएँ या वनों में जाकर नाम जपने लगें। भक्ति का सच्चा मार्ग समाज में रहते हुए जागरूक होकर कर्म करते रहना है। दूसरों के साथ विश्वासघात न करें, किसी के अधिकार पर डाका न डालें और ठगी से दूर रहें।
ये भी पढ़ें अक्षय तृतीया 2026 कब है इस दिन सोना खरीदना क्यों माना जाता है शुभ जानिए पूजा का सही मुहूर्तअपने हाथों से प्रतिदिन पुण्य कार्य करें और हृदय से परमात्मा का स्मरण बनाए रखें। किसी का दिल न दुखाएँ और जीवन के अंतिम क्षण तक कर्मशील बने रहें। अपने प्रत्येक कण में परमात्मा की उपस्थिति का अहसास करें और उसकी याद को आत्मा में बनाए रखें।
यदि आप अपनी दिनचर्या इसी प्रकार व्यवस्थित करेंगे, तो अपने वास्तविक घर यानी परमात्मा की ओर लौटने का मार्ग सरल और सुगम हो जाएगा।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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