सत्संग का महत्व: सच्ची संगति कैसे बचाती है जीवन को विकारों से

भागदौड़ भरी आधुनिक जीवनशैली और मानसिक तनाव के बीच 'सत्संग' आज भी आत्मिक शांति और चरित्र निर्माण का सबसे सशक्त माध्यम बना हुआ है। आध्यात्मिक विद्वानों का मत है कि सत्संग केवल प्रवचन सुनना नहीं, बल्कि 'सच्ची संगति' में बैठना है। यह संगति किसी आत्मज्ञानी संत की भी हो सकती है और सही मार्ग दिखाने वाली ज्ञानवर्धक पुस्तकों की भी।
विषय-विकारों से सुरक्षा की 'बाड़' है सत्संग जिस प्रकार खेत के चारों ओर लगी बाड़ न केवल अंकुरित पौधों की रक्षा करती है, बल्कि तैयार फसल को भी जंगली जानवरों और चोरों से बचाती है, ठीक उसी प्रकार सत्संग मनुष्य के जीवन में एक सुरक्षा कवच का कार्य करता है। यह व्यक्ति को काम, क्रोध, लोभ जैसे विषय-विकारों और बुरे कर्मों से दूर रखता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सत्संग साधक के भीतर पनपने वाले 'अहंकार' का दमन करता है, जो पतन का मुख्य कारण होता है।
ये भी पढ़ें चैत्र नवरात्र का पांचवां दिन: मां स्कंदमाता की पूजा से मिलता है संतान सुख और ज्ञान का आशीर्वादभौतिक उन्नति न सही, अपराधों से तो बचता है इंसान अक्सर देखा गया है कि सत्संग से दूरी बनाते ही मन पुन: पुरानी बुराइयों की ओर भागने लगता है। विद्वान उदाहरण देते हैं कि पानी में पड़ा पत्थर भले ही पानी में न घुले, लेकिन वह कम से कम सूर्य की तपिश से तो बचा ही रहता है। इसी तरह, यदि कोई व्यक्ति सत्संग में जाकर बहुत अधिक भौतिक प्रगति नहीं कर पाता, तब भी वह अनेक पापों और अपराधों से सुरक्षित रहता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे एक अंधा व्यक्ति बाग में जाकर फूलों के रंग तो नहीं देख सकता, लेकिन उनकी खुशबू का आनंद अवश्य ले सकता है।
लोहे से सोना नहीं, सीधे 'पारस' बनने की प्रक्रिया सत्संग के प्रति निरंतर प्रेम और श्रद्धा रखने से मन की अवस्था में धीरे-धीरे सकारात्मक परिवर्तन आने लगता है। आध्यात्मिक ग्रंथों में सत्संग की तुलना 'पारस' से की गई है। पारस पत्थर लोहे को छूकर सोना बनाता है, लेकिन सत्संग की महिमा इससे भी बड़ी है; यह जीव को केवल 'सोना' (श्रेष्ठ) ही नहीं बनाता, बल्कि उसे स्वयं 'पारस' (ज्ञानवान) बना देता है।
अतः, वर्तमान समय में मानसिक क्लेशों से मुक्ति और सदाचार युक्त जीवन के लिए सत्संग से जुड़ाव अनिवार्य प्रतीत होता है।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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