धर्म का वास्तविक अर्थ: केवल दिखावे नहीं, आचरण में हो
हम अपने आप को धार्मिक मानते हैं, परंतु अधिकांश लोग धर्म का वह मूल तत्व नहीं जानते जो वास्तव में हमारे जीवन का मार्गदर्शन करता है। धर्म केवल पूजा, पाठ या बाहरी प्रदर्शन की वस्तु नहीं है, धर्म तो हमारे दैनिक आचरण और व्यवहार में होना चाहिए।
हम मानते हैं कि झूठ बोलना अधर्म है, फिर भी हमारे व्यवहार में झूठ बोलना आम हो गया है। चोरी करना, किसी को सताना, धोखा देना, विश्वासघात करना, रिश्वत लेना या रिश्वत देना – ये सभी अधर्म हैं, परंतु हमारे आचरण में इनका होना आम दृष्टांत बन चुका है। इस तरह हम धार्मिक होने का दावा करते हुए भी धर्म के वास्तविक सिद्धांतों से दूर हो गए हैं।
ये भी पढ़ें चंद्र ग्रहण: आज अयोध्या में रामलला और हनुमानगढ़ी के दर्शन बंद, सूतक काल के दौरान बरतें ये सावधानियांकृतज्ञता, यानी किसी के किए उपकार के प्रति धन्यवाद और आदर प्रकट करना, सबसे बड़ा धर्म माना गया है। आज के समय में इसके विपरीत उपकारी के अपकार को अपना धर्म समझ लिया गया है। धर्म के नाम पर अनेक लकीरें खींच दी गई हैं, और जितना अधिक धार्मिक होने का दिखावा किया जा रहा है, उतना ही हमारे आचरण में धर्म की कमी दिखाई देती है।
हमें पहले धर्म के मर्म को समझना होगा। वह धर्म जो केवल दिखावा हो, असली धर्म नहीं है। असली धर्म वह है जो हमारे व्यवहार और सोच में झलकता हो। याद रखिए, परमपिता परमात्मा बाहरी दिखावे से प्रभावित नहीं होते। वे आपके आचरण, व्यवहार और मन के विचारों को देखते हैं।
कथनी और दिखावे से कोई धार्मिक नहीं बन सकता। केवल वही स्वयं को धार्मिक मान सकता है, जिसका धर्म उसके जीवन और व्यवहार में प्रतिफलित होता है। धर्म केवल मान्यता नहीं, जीवन जीने का तरीका होना चाहिए।
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