सुख का असली स्रोत: लोभ, धन और प्रभु की कृपा पर विचार
शास्त्रों का यह वचन सदैव प्रासंगिक है कि सुख और दुख केवल मन की अनुभूतियाँ हैं। विडंबना यह है कि आधुनिक मनुष्य सांसारिक वस्तुओं में ही सुख का भ्रम पाले बैठा है। वह सुख को पकड़ने के लिए लोभ रूपी अथाह नदी में छलांग तो लगाता है, लेकिन अंततः उसके हाथ केवल निराशा ही लगती है।
सुख सुविधाओं के बीच भी क्यों है असंतोष? आज इंसान के पास सुख-सुविधाओं के तमाम साधन मौजूद हैं, फिर भी मन अशांत और असंतुष्ट है। इसका मूल कारण यह है कि सुख वस्तुओं में नहीं, बल्कि संतोष में है। मनुष्य के पास जो उपलब्ध है, वह उससे सुख का अनुभव नहीं कर पाता और पूरी आयु 'अभाव' का रोना रोते हुए बिता देता है। सत्य तो यह है कि वास्तविक सुख केवल प्रभु की कृपा से ही संभव है। यदि कोई व्यक्ति केवल धन संचय को ही लक्ष्य मान ले और सोने का बिछौना भी बनवा ले, तो भी वह चैन की नींद नहीं पा सकेगा। संचय की इस होड़ का परिणाम अक्सर कोर्ट-कचहरी और अस्पतालों के चक्करों के रूप में सामने आता है।
परमात्मा की ओर चलें, संसार की ओर नहीं यदि जीवन में वास्तविक आनंद की अभिलाषा है, तो सुख-स्वरूप परमात्मा की ओर कदम बढ़ाना होगा। संसार की ओर भागने से केवल दुखों में वृद्धि होती है और मनुष्य शाश्वत सुख से वंचित रह जाता है। प्रत्येक मनुष्य के भीतर 'भगवान' और 'शैतान' दोनों प्रवृत्तियाँ मौजूद हैं।
भगवत्ता जगाने के लिए पुरुषार्थ की आवश्यकता अपने भीतर के दिव्य भाव (भगवत्ता) को जगाने के लिए पूरी शक्ति लगानी पड़ती है। आध्यात्मिक उन्नति 'आरोहण' (ऊपर चढ़ने) के समान है, जिसमें ऊर्जा और संकल्प की आवश्यकता होती है, जबकि पतन या 'अवरोहण' तो बिना किसी प्रयास के स्वयं ही हो जाता है।
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संचय बनाम त्याग: जो केवल संचय (इकट्ठा) कर रहा है, वह वास्तव में अपनी दिव्यता खो रहा है और अपने भीतर के शैतान को जागृत कर रहा है।
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दिव्य भाव: इसके विपरीत, जो अपने पास उपलब्ध संसाधनों और प्रेम को बांटने के लिए तत्पर रहता है, वह अपने भीतर के दिव्य भाव को जागृत कर लेता है और मनुष्य से नारायण (भगवान) बनने की राह पर अग्रसर हो जाता है।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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