भीतर की शुद्धि ही वास्तविक साधना, विकारों को दबाना समाधान नहीं
मानवीय जीवन में विकारों का अस्तित्व एक ऐसा सच है जिसे हम अक्सर बाहरी परिस्थितियों के मत्थे मढ़ देते हैं। वास्तव में विकार व्यक्ति के भीतर ही निवास करते हैं और बाहरी जगत में वे केवल क्रिया के रूप में प्रकट होते हैं। बाहरी गतिविधियों को देखकर यह आभास तो हो जाता है कि किसी व्यक्ति के भीतर विकार मौजूद हैं, किन्तु उनका जन्म और पोषण मन के अंधेरे कोनों में ही होता है। यदि ये विकार बाहर से आते, तो समाज उनसे बचकर भाग सकता था या उन्हें आने से पहले ही रोक सकता था, परंतु इनका स्रोत हमारे भीतर है, इसलिए इनसे दूर भागना संभव नहीं है।
अक्सर शांति और संयम की तलाश में मनुष्य वनों और पहाड़ों की गुफाओं की ओर रुख करता है। यह एक भ्रामक धारणा है कि स्थान परिवर्तन से विकारों का अंत हो जाएगा। यदि भीतर से विकारों को निकालने का वास्तविक प्रयास नहीं किया गया, तो वनों में जाकर की गई तपस्या भी व्यर्थ ही सिद्ध होगी। पहाड़ की शांत गुफाएं हमारे भीतर के क्रोध या लोभ को नष्ट नहीं कर सकतीं, उन्हें निकालने का उत्तरदायित्व स्वयं हमारा ही है। यदि मन विकारों से मुक्त हो जाए, तो संसार की भीड़-भाड़ वाली बस्ती में रहने से भी कोई हानि नहीं होती, क्योंकि विकार तो वनों में भागने वालों के साथ भी उतनी ही तीव्रता से मौजूद रहते हैं।
मनोवैज्ञानिक स्तर पर देखा जाए तो मान-हानि के भय या मान-प्राप्ति के लोभ से जब हम विकारों को रोकने का प्रयास करते हैं, तो वे कुछ समय के लिए दब तो जाते हैं, लेकिन नष्ट नहीं होते। इसे एक बालक और अध्यापक के उदाहरण से समझा जा सकता है। जिस प्रकार एक अध्यापक के डंडे के भय से बालक खिलौने को हाथ से छोड़ तो देता है, परंतु उसका मन खिलौने में ही अटका रहता है, ठीक वैसी ही स्थिति एक साधक की होती है। यदि कोई व्यक्ति केवल समाज में सम्मान पाने के लिए या अपमान से बचने के लिए अपनी कर्मेन्द्रियों से बुरे कार्यों को छोड़ देता है, लेकिन मन में बुरे भावों को पाले रखता है, तो उसकी सारी साधना निष्फल है।
विकारों का दमन उन्हें और अधिक शक्तिशाली बनाता है। जब तक हृदय से बुरे भावों का उन्मूलन नहीं होता, तब तक बाहर से अच्छा आचरण करते हुए भी भीतर बुराई का प्रवाह बना रहता है। ऐसे में जैसे ही अनुकूल अवसर मिलता है, दबे हुए विकार फिर से प्रचंड रूप में प्रकट हो जाते हैं। इसलिए आध्यात्मिक और मानसिक उन्नति के लिए विकारों को दबाना नहीं, बल्कि उन्हें अंदर से पूरी तरह निकालना ही अनिवार्य है। वास्तविक सदाचार वही है जो भय से नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि और विवेक से उत्पन्न होता है।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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