संभल में तैयार हर्बल गुलाल चेहरे के लिए सुरक्षित और पर्यावरण मित्र होली की बेहतर पहल
सुरक्षित रंग, प्राकृतिक खुशबू और रोज़गार के साथ हर्बल गुलाल होली के पर्व को सचमुच बना रहा खुशियों का त्योहार
संभल। होली के रंग जहां खुशियां लाते हैं, वहीं केमिकल युक्त गुलाल कई बार त्वचा, आंख और बच्चों के लिए नुकसानदेह साबित होता है। इसी समस्या को देखते हुए उत्तर प्रदेश के जनपद संभल के रहने वाले हर्ष गुप्ता ने पूरी तरह हर्बल और ऑर्गेनिक गुलाल बनाने की पहल की। उनकी यह पहल आज उप्र तक में सीमित नहीं रही बल्कि 10 से 12 राज्यों में लोगों की पसंद बन चुका है।
होली रंगों का त्योहार है। होली का पर्व नजदीक आते ही हाथरस के रंगों की बात लोगों की जुबान पर आ जाती है, लेकिन अब उत्तर प्रदेश का संभल भी इससे पीछे नहीं है। पिछले 40 वर्षों से संभल में रंग तैयार हो रहा है और यह रंग भारत देश के 10 से 12 राज्यों में जाता है। पहले उत्तर प्रदेश क्या अन्य राज्यों के लोग भी रंग लेने के लिए हाथरस जाते थे, लेकिन अब संभल के रंगों की डिमांड प्रदेश सहित अन्य राज्यों में बढ़ती जा रही है।
ये भी पढ़ें मुरादाबाद में MDA की महत्वाकांक्षी गोविंदपुरम योजना लॉन्च, 47 लाख से शुरू प्लॉट, 580 करोड़ का निवेशरंगों के विषय में हर्ष गुप्ता बताते हैं कि हर्बल गुलाल बनाने का विचार इसलिए आया ताकि लोग बिना किसी डर के होली खेल सकें। इस गुलाल में पोटैटो स्टार्च (आलू का आटा) और कॉर्न स्टार्च (मक्का का आटा) का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें फ़ूड कलर और अहमदाबाद व कन्नौज के फूलों की प्राकृतिक खुशबू मिलाई जाती है। तैयार मिश्रण को खेतों में तिरपाल पर 7–8 दिन तक प्राकृतिक धूप में सुखाया जाता है। फिर उसकी पिसाई कर अलग-अलग पैकिंग में बाज़ार भेजा जाता है। करीब 28 साल पहले फैक्ट्री स्तर पर शुरू हुआ यह काम, अनुभव के लिहाज़ से आज 40–45 साल का सफर तय कर चुका है। यहां रोज़ाना 2 से ढाई टन तक गुलाल तैयार होता है। बच्चों के लिए खासतौर पर स्किन-लविंग और एलर्जी-फ्री गुलाल, गुलाल की पिचकारी, चॉकलेट, मिंट और नारियल खुशबू वाले रंग भी बनाए जाते हैं।
हर्ष ने बताया कि हर्बल गुलाल न सिर्फ सुरक्षित है बल्कि पर्यावरण के लिए भी बेहतर है, क्योंकि यह मिट्टी में घुल जाता है और पानी को प्रदूषित नहीं करता। होली के सीज़न में इस फैक्टरी से 40–50 स्थानीय लोगों को रोज़गार भी मिलता है। हर्ष गुप्ता के मुताबिक उनका गुलाल खास तौर पर उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद और बरेली समेत कई जिलों में सबसे ज़्यादा पसंद किया जाता है। प्राकृतिक तरीके से बनने और अधिक मेहनत लगने के कारण हर्बल गुलाल आम गुलाल से थोड़ा महंगा जरूर है, लेकिन सेहत और पर्यावरण के लिहाज़ से यह कहीं बेहतर विकल्प साबित हो रहा है।
हिन्दुस्थान समाचार / Nitin Sagar
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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