बसपा में बड़ा फेरबदल: आकाश आनंद के ससुर अशोक सिद्धार्थ का बढ़ा कद, रामजी गौतम के 'पर कतरे'
लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती ने 2027 के विधानसभा चुनाव और आगामी अन्य राज्यों के चुनावों को देखते हुए संगठन में बड़ा फेरबदल किया है। इस बदलाव में सबसे चौंकाने वाला नाम डॉ. अशोक सिद्धार्थ का है, जो नेशनल को-ऑर्डिनेटर आकाश आनंद के ससुर हैं। मायावती ने उन्हें राष्ट्रीय पदाधिकारियों की सूची में नंबर एक पर रखते हुए चार राज्यों की कमान सौंपी है।
अशोक सिद्धार्थ बने 'नंबर वन', रामजी गौतम का प्रभाव घटा
पार्टी में अब तक नंबर एक की हैसियत रखने वाले रामजीलाल गौतम की जिम्मेदारियों में बड़ी कटौती की गई है।
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अशोक सिद्धार्थ: इन्हें दिल्ली, गुजरात, छत्तीसगढ़ और केरल का प्रभारी बनाया गया है। गौरतलब है कि अशोक सिद्धार्थ को पिछले साल फरवरी में पार्टी से निष्कासित किया गया था, लेकिन सितंबर 2025 में उनकी वापसी हुई और अब उन्हें सबसे महत्वपूर्ण पद दिया गया है।
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रामजी गौतम: इनसे दिल्ली, एमपी, झारखंड और बिहार जैसे बड़े राज्य वापस लेकर अब महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु की जिम्मेदारी दी गई है।
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राजाराम: इन्हें अब मध्य प्रदेश, बिहार और झारखंड का नया प्रभारी नियुक्त किया गया है।
नौशाद अली के जरिए मुस्लिम कार्ड और क्षेत्रीय बदलाव
मायावती ने मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए नौशाद अली का कद बढ़ाया है। उन्हें उत्तर प्रदेश के चार सबसे महत्वपूर्ण मंडलों— कानपुर, लखनऊ, आगरा और मेरठ का प्रभारी बनाया गया है। बसपा की रणनीति में इन मंडलों को जीत की कुंजी माना जाता है।
इसके अलावा अन्य नियुक्तियां इस प्रकार हैं:
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गिरीश चंद्र: उत्तराखंड के प्रभारी।
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सुमरत सिंह: राजस्थान के प्रभारी।
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यूपी के 18 मंडल: सभी 18 मंडल प्रभारियों के कार्यक्षेत्र में बदलाव कर नई ऊर्जा फूंकने की कोशिश की गई है।
कौन हैं डॉ. अशोक सिद्धार्थ?
पेशे से डॉक्टर और पूर्व सरकारी कर्मचारी अशोक सिद्धार्थ 2007 में इस्तीफा देकर बसपा में शामिल हुए थे। वे दो बार एमएलसी और एक बार राज्यसभा सांसद रह चुके हैं। बामसेफ के दौर से ही वे मायावती के भरोसेमंद रहे हैं। बीच में गुटबाजी के आरोपों में बाहर होने के बाद उनकी यह वापसी पार्टी के भीतर उनके बढ़ते दबदबे को दर्शाती है।
'मिशन 2027' की तैयारी
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती ने यह कदम 'बूथ और सेक्टर' स्तर पर पार्टी के पुनर्गठन के साथ-साथ युवाओं को 50 प्रतिशत भागीदारी देने के अपने वादे को जमीन पर उतारने के लिए उठाया है। वफादार नेताओं को आगे रखकर बसपा अपने पारंपरिक दलित-मुस्लिम गठजोड़ को फिर से जीवित करने की कोशिश कर रही है।
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