"1978 के संभल दंगे पर बन रही फिल्म 'कल्कि संभल' विवादों में..निर्माता अमित जानी को मिली शूटिंग रोकने की धमकी
संभल । उत्तर प्रदेश के संभल (Sambhal) में 1978 में हुए दंगों पर आधारित फिल्म ‘कल्कि संभल’ (पूर्व नाम 'संभल फाइल्स') को लेकर विवाद गहरा गया है। फिल्म के निर्माता अमित जानी ने दावा किया है कि उन्हें फिल्म की शूटिंग रोकने और जान से मारने की धमकियाँ मिल रही हैं।यह फिल्म न केवल 1978 के दंगों, बल्कि 24 नवंबर 2024 को संभल जामा मस्जिद सर्वे के दौरान हुई हालिया हिंसा को भी पर्दे पर दिखाने की तैयारी में है। फिल्म ‘कल्कि संभल’ की शूटिंग नहीं होने देने की धमकी के बाद फिल्म प्रोड्यूसर अमित जानी ने कहा- फिल्म की शूटिंग होगी या नहीं, यह फैसला योगी सरकार लेगी। कोई मुल्ला या मौलाना इस पर निर्णय नहीं देगा।
दरअसल, यह फिल्म संभल के 1978 के दंगों और 24 नवंबर 2024 की हिंसा पर आधारित है। 2 फरवरी को फिल्म का पोस्टर रिलीज किया गया। दो प्रमुख किरदार ‘अब्बाजान’ और ‘भाईजान’ सामने आए। विजय राज और महेश मांजरेकर अभिनीत इस फिल्म के प्रोड्यूसर अमित जानी हैं। लेकिन फिल्म का पोस्टर सामने आने के बाद बवाल भी शुरू हो गया। सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क के पिता ममलूकुर्रहमान बर्क ने शूटिंग नहीं होने देने का ऐलान किया है।
विवाद और धमकी की मुख्य वजह
फिल्म निर्माता अमित जानी, जो इससे पहले 'उदयपुर फाइल्स' को लेकर चर्चा में रहे थे, उन्होंने हाल ही में इस फिल्म का पोस्टर जारी किया था:
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भड़काऊ कंटेंट का आरोप: विपक्षी दलों (समाजवादी पार्टी और कांग्रेस) और कई स्थानीय संगठनों ने आरोप लगाया है कि यह फिल्म सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने और एक विशिष्ट समुदाय को निशाना बनाने के लिए बनाई जा रही है।
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किरदारों पर विवाद: फिल्म में 'अब्बाजान' और 'भाईजान' नामक किरदारों का उपयोग किया गया है। 'अब्बाजान' के जरिए 1978 के दंगों और 'भाईजान' के जरिए 2024 की हिंसा की कहानी को जोड़ा गया है, जिसे लोग वर्तमान राजनीतिज्ञों से जोड़कर देख रहे हैं।
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सोशल मीडिया पर जंग: पोस्टर जारी होने के बाद से ही सोशल मीडिया पर दो पक्षों के बीच तीखी बहस और धार्मिक नारों की होड़ मच गई है।
अमित जानी का दावा
निर्माता अमित जानी ने इस मामले में पुलिस और सरकार से सुरक्षा की मांग की है।
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धमकी भरे कॉल: उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें अज्ञात नंबरों से फोन कर शूटिंग न करने और अंजाम भुगतने की धमकियाँ दी जा रही हैं।
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"सच्चाई दिखाने से रोकना": जानी का तर्क है कि वे केवल इतिहास की उन परतों को खोल रहे हैं जिन्हें दशकों तक दबाया गया। उनका कहना है कि 1978 के दंगों में कई बेगुनाहों की जान गई थी, जिसकी सच्चाई दुनिया के सामने आनी चाहिए।
1978 का संभल दंगा: ऐतिहासिक संदर्भ
सरकार और प्रशासन ने भी हाल के महीनों में 1978 के दंगों की फाइलों की जांच तेज कर दी है। प्रशासन इस बात की समीक्षा कर रहा है कि क्या फिल्म की शूटिंग से जिले की कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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