फरवरी में भिंडी की बुवाई से पहले जान लें ये जरूरी उपाय, येलो वेन मोजैक वायरस से बचकर पाएं 90 प्रतिशत तक ज्यादा पैदावार
फरवरी का महीना आते ही गर्मी की भिंडी की बुवाई की तैयारियां तेज हो जाती हैं। लेकिन इस फसल के सामने सबसे बड़ी चुनौती येलो वेन मोजैक वायरस है। यह रोग यदि समय पर नियंत्रित न किया जाए तो 80 से 90 प्रतिशत तक पैदावार को नुकसान पहुंचा सकता है। अच्छी बात यह है कि सही तकनीक और थोड़ी सतर्कता अपनाकर इस भारी नुकसान से बचा जा सकता है। अगर शुरुआत मजबूत होगी तो फसल भी शानदार मिलेगी।
बीज उपचार से करें मजबूत शुरुआत
भिंडी की खेती में सही बीज उपचार आधी सफलता तय कर देता है। बुवाई से पहले बीजों को 4 से 6 घंटे तक पानी में भिगोकर रखना चाहिए। चाहें तो पूरी रात भी भिगो सकते हैं। इससे अंकुरण बेहतर होता है और पौधे मजबूत बनते हैं। बीजों में पर्याप्त नमी मिलने से शुरुआती बढ़वार तेज होती है और पौधे रोगों का सामना करने में सक्षम बनते हैं।
इसके साथ ही बुवाई के समय रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करना बेहद जरूरी है। पूसा ए 4 अरका अनामिका और परभणी क्रांति जैसी किस्में वायरस के खिलाफ बेहतर सहनशीलता रखती हैं। सही किस्म का चुनाव आगे होने वाले जोखिम को काफी हद तक कम कर देता है।
ये भी पढ़ें लाल गोभी की खेती से 110 दिन में लाखों की कमाई, गर्मी में हाई वैल्यू फसल से किसानों को बड़ा फायदायेलो वेन मोजैक वायरस से कैसे बचें
येलो वेन मोजैक वायरस सीधे पौधे को नहीं बल्कि सफेद मक्खी के माध्यम से फैलता है। इसलिए इस कीट को नियंत्रित करना सबसे जरूरी कदम है। यदि खेत में सफेद मक्खी की संख्या बढ़ने लगे तो तुरंत नियंत्रण उपाय अपनाएं। इमिडाक्लोप्रिड 0.3 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना लाभकारी माना जाता है। जरूरत पड़ने पर सिस्टेमिक कीटनाशक का प्रयोग भी किया जा सकता है।
अगर खेत में कुछ पौधे संक्रमित दिखें तो उन्हें तुरंत उखाड़कर नष्ट कर दें। संक्रमित पौधों को जमीन में दबा देना बेहतर रहता है ताकि वायरस स्वस्थ पौधों तक न फैले। समय पर यह कदम उठाने से नुकसान सीमित रखा जा सकता है।
जैविक तरीके से भी करें सुरक्षित प्रबंधन
जो लोग रसायनों का कम उपयोग करना चाहते हैं उनके लिए नीम तेल एक प्रभावी विकल्प है। 4 मिलीलीटर नीम तेल प्रति लीटर पानी में मिलाकर 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करने से सफेद मक्खी पर अच्छा नियंत्रण पाया जा सकता है। यह तरीका पर्यावरण के अनुकूल है और लागत भी कम रखता है। जैविक उपाय अपनाने से फसल की गुणवत्ता बेहतर रहती है और बाजार में अच्छे दाम मिलने की संभावना बढ़ती है।
सही तकनीक से बचाएं 90 प्रतिशत तक नुकसान
भिंडी की फसल में येलो वेन मोजैक वायरस बड़ी चुनौती जरूर है लेकिन सही बीज उपचार रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन और नियमित कीट नियंत्रण से 80 से 90 प्रतिशत तक संभावित नुकसान से बचा जा सकता है। वैज्ञानिक तरीके से की गई खेती न केवल उत्पादन बढ़ाती है बल्कि किसान की आय भी सुरक्षित रखती है। थोड़ी सावधानी और समय पर कार्रवाई आपकी मेहनत को सफल बना सकती है।
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