ककड़ी की खेती में खतरनाक रोग और लाल कीड़ा से ऐसे करें बचाव वरना पूरी फसल हो सकती है खराब
अगर आप कम समय में अच्छी कमाई देने वाली खेती की तलाश में हैं तो ककड़ी की खेती आपके लिए एक शानदार विकल्प बन सकती है। गर्मी का मौसम शुरू होते ही बाजार में ककड़ी की मांग तेजी से बढ़ने लगती है। यही वजह है कि मार्च का महीना इसकी बुवाई के लिए काफी अनुकूल माना जाता है। सही समय पर सही तकनीक के साथ ककड़ी की खेती की जाए तो बहुत कम समय में अच्छी पैदावार मिलती है और किसान बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं।
मार्च में क्यों फायदेमंद होती है ककड़ी की खेती
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मार्च के महीने में तापमान और मिट्टी की नमी ककड़ी की फसल के लिए काफी अनुकूल होती है। इस मौसम में पौधों का विकास तेजी से होता है और फसल जल्दी तैयार हो जाती है।
ये भी पढ़ें गमले में मिर्च का पौधा है लेकिन फल कम लग रहे हैं तो आज ही अपनाएं ये आसान घरेलू खाद का तरीकाककड़ी की खेती का पूरा चक्र लगभग साठ से सत्तर दिनों का होता है। बुवाई के करीब चालीस से पैंतालीस दिन बाद ही फल की तुड़ाई शुरू हो जाती है। यही कारण है कि कम समय में किसानों को बाजार से अच्छी आमदनी मिलने की संभावना रहती है।
ये भी पढ़ें गर्मियों में तेजी से कमाई का मौका लाल भाजी मेथी और चौलाई की खेती से किसान पा सकते हैं शानदार मुनाफासही तरीके से करें खेत की तैयारी
ककड़ी की अच्छी पैदावार के लिए खेत की तैयारी बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके लिए सबसे पहले खेत में एक से दो बार गहरी जुताई करनी चाहिए ताकि मिट्टी भुरभुरी हो सके और पौधों की जड़ें आसानी से फैल सकें।
इसके बाद लगभग पांच फीट चौड़ी क्यारियां और दो से ढाई फीट की नालियां बनाना बेहतर माना जाता है। इस तरीके से पानी का निकास सही रहता है और पौधों का विकास भी बेहतर होता है।
अच्छी पैदावार के लिए सही किस्म का चयन जरूरी
बेहतर उत्पादन के लिए उन्नत और हाइब्रिड किस्मों का चयन करना बहुत जरूरी होता है। अच्छी किस्मों में उत्पादन अधिक होता है और फल की गुणवत्ता भी बेहतर रहती है।
मार्च में बुवाई के बाद नियमित सिंचाई करना जरूरी होता है। इसके साथ मल्चिंग तकनीक अपनाने से मिट्टी की नमी बनी रहती है और खरपतवार कम उगते हैं। इस तकनीक से उत्पादन में लगभग बीस से तीस प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी जा सकती है।
ककड़ी की खेती में कीट और रोग से बचाव
ककड़ी की फसल में कुछ कीट और रोग नुकसान पहुंचा सकते हैं। इनमें पत्ती काटने वाला कीट जिसे लाल कीड़ा कहा जाता है सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। यह कीट पौधों की पत्तियों को नुकसान पहुंचाकर फसल की बढ़वार को प्रभावित करता है।
इसके नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड दवा का उपयोग किया जा सकता है। इसे दो मिली प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से कीट नियंत्रण में मदद मिलती है।
इसके अलावा रेड पंपकिन बीटल जैसे कीटों के नियंत्रण के लिए साइपरमेथ्रिन आधारित दवा का उपयोग भी प्रभावी माना जाता है। इसका छिड़काव डेढ़ से दो मिली प्रति लीटर पानी में मिलाकर किया जाता है।
फफूंद जनित रोगों से ऐसे करें बचाव
ककड़ी की फसल में पाउडरी मिल्ड्यू और डाउनी मिल्ड्यू जैसे रोग भी देखे जाते हैं। जब मौसम में नमी ज्यादा होती है और तापमान लगभग चौबीस से तीस डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है तब यह रोग तेजी से फैल सकते हैं।
इन रोगों के कारण पत्तियों पर सफेद या राख जैसे धब्बे बन जाते हैं और धीरे धीरे पत्तियां पीली होकर सूखने लगती हैं। इससे फसल की पैदावार पर भी असर पड़ता है।
इससे बचाव के लिए पौधों के बीच पर्याप्त दूरी रखना जरूरी होता है और नाइट्रोजन का अधिक उपयोग नहीं करना चाहिए। शुरुआती अवस्था में फफूंदनाशक दवा का छिड़काव करने से इन रोगों को नियंत्रित किया जा सकता है।
कम समय में ज्यादा मुनाफा देने वाली खेती
ककड़ी की खेती उन फसलों में शामिल है जो कम समय में तैयार हो जाती हैं और बाजार में अच्छी कीमत दिला सकती हैं। गर्मी के मौसम में इसकी मांग बढ़ जाती है जिससे किसानों को बेहतर दाम मिल सकते हैं।
अगर सही तरीके से खेती की जाए तो एक एकड़ खेत से अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है और कम समय में अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। यही कारण है कि कई किसान अब पारंपरिक फसलों के साथ साथ ककड़ी की खेती को भी अपनाने लगे हैं।
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युवा और ऊर्जावान पत्रकार चयन प्रजापत 'रॉयल बुलेटिन' के लिए मध्य प्रदेश के इंदौर से रिपोर्टिंग कर रहे हैं। आपकी मुख्य विशेषज्ञता खेल (Sports), कृषि (Farming) और ऑटोमोबाइल (Automobile) सेक्टर में है। चयन प्रजापत इन विषयों की तकनीकी समझ के साथ-साथ ज़मीनी हकीकत को अपनी खबरों में पिरोने के लिए जाने जाते हैं। इंदौर और मालवा क्षेत्र की खबरों के साथ-साथ ऑटोमोबाइल और खेल जगत की विशेष कवरेज के लिए आप रॉयल बुलेटिन के एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।

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