सुखी रहने का शार्टकट

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सुखी रहने का शार्टकट है कि अपने जीवन में कोई झंझट न पालो। किसी जीव अथवा पशु-पक्षी से इतना मोह न बाँधो कि उनके जाने के बाद अनावश्यक रूप से परेशान होना पड़े या रोना पड़े। लोग विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षियों को पालतू बना लेते हैं। फिर उसके बाद इंसानों की तरह उनकी देखरेख, खानपान, […]

सुखी रहने का शार्टकट है कि अपने जीवन में कोई झंझट न पालो। किसी जीव अथवा पशु-पक्षी से इतना मोह न बाँधो कि उनके जाने के बाद अनावश्यक रूप से परेशान होना पड़े या रोना पड़े।

लोग विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षियों को पालतू बना लेते हैं। फिर उसके बाद इंसानों की तरह उनकी देखरेख, खानपान, डाक्टरी सुविधाओं आदि के लिए समय निकालना पड़ता है। आपाधापी वाले जीवन में आजकल उसकी कमी सबसे ज्यादा रहती है।

मैं सोचने लगी कि दो-चार प्रकार के ही जीव-जन्तु होंगे जिन्हें लोग पालतू बनाते हैं पर गहराई से सोचने पर तो लिस्ट बढ़ती ही जाने लगी। हम इन पालतू जीवों का इस प्रकार वर्गीकरण कर सकते हैं-

1. अपने शौक के लिए कुत्ता, बिल्ली, तोता, मोर, रंग-बिरंगी चिडिय़ाँ, बतख, कबूतर, बटेर, सुन्दर चमकीली मछलियां, कछुआ आदि पालते हैं।
2. रोजी-रोटी के लिए लोग बंदर, साँप, नेवला, भालू, हाथी, घोड़ा, गधा, खच्चर आदि जीवों को पालते हैं।
3. दूध के व्यवसाय के लिए गाय, भैंस और बकरी आदि को पालते हैं।

4. मुर्गियों को भी अपने व्यवसाय के लिए पालते हैं।
5. कृषि के लिए बैलों आदि को पालते हैं।
घोड़ा, भैंसा, बैल, गधा आदि को आज भी सवारी के लिए प्रयोग में लाते हैं।

हाथी भी प्रदर्शन का एक बड़ा माध्यम है। अनेक स्थानों पर इसकी आवश्यकता होती है। बंदर, साँप, नेवला और भालू के खेल हम प्राय: देखते रहते हैं।
विदेशों में तो इन पशु-पक्षियों के अतिरिक्त और भी न जाने किन-किन जीवों को पालते रहते हैं जिनके बारे में डिस्कवरी आदि टीवी चैनलों पर हम अक्सर देखते रहते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि विभिन्न प्रकार के पशुओं को हम अपनी जरुरत, मनोरंजन, घर की सजावट व सुरक्षा के लिए पालते हैं।

कहते हैं पशु के साथ पशु बनना पड़ता है तभी इनका पालन कर सकते है। इनके रहने व खाने के लिए भी समुचित व्यवस्था करनी पड़ती है। अब शहरों में तो स्थानाभाव के कारण यह संभव नहीं हो पाता। कभी हम भारतीयों की समृद्धि के प्रतीक कहे जाने वाले गोधन, गजधन और बाजिधन अब घरों से लुप्त हो गए हैं। अब मु_ी भर लोगों के लिए ये व्यवसाय बनकर रह गए हैं।

घरों में प्राय: कुत्तों को पाला जाता है। उनका स्वास्थ्य परीक्षण, खानपान की व्यवस्था, उन्हें प्रात: सायं सैर के लिए ले जाना आदि नियमित जिम्मेदारी होती है। यदि वे किसी को काट लें तो और समस्या हो जाती है। इसी प्रकार बिल्लियों और खरगोश को भी पालते समय पूरी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है।

मछलियों को एक्वेरियम में सजा कर रखा जाता है। उनका पानी निश्चित अवधि में बदलना, खाने का प्रबन्ध करना आदि आवश्यक होता है। देखभाल में जरा सी चूक हो जाए तो मछलियाँ मर जाती हैं।

इसी प्रकार अन्य सभी पशुओं की भी देखरेख, नियमित खानपान और उनके स्वास्थ्य आदि के प्रति सचेत रहना पड़ता है।
कहने का सीधा-सा अर्थ है कि पशु भी बच्चों के समान पाले जाने चाहिए। यदि कहीं परिवार सहित घर से दूर जाना हो तो बड़ी विकट समस्या हो जाती है। पीछे उन जीवों की देखरेख में कमी न हो, बस यही चिन्ता सताती रहती है।

इन्हीं सभी प्रकार की समस्याओं को देखते हुए कहा है-
‘जे सुख लोड़ें जिन्दडि़ए ते कुकड़ी वी न रख।’अर्थात् मनुष्य को जीवन में यदि सुकून से रहना हो तो उसे मुर्गी तक नहीं पालनी चाहिए।
-चन्द्र प्रभा सूद

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