दिल्ली हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: धर्मशाला में जन्मी तिब्बती महिला भारतीय नागरिक घोषित
नयी दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने जन्म के आधार पर नागरिकता की संवैधानिक गारंटी को बरकरार रखते हुए एक महत्वपूर्ण फैसले में 1966 में धर्मशाला में जन्मी तिब्बती मूल की महिला को भारतीय नागरिक घोषित किया है। न्यायालय ने अधिकारियों को उसे तुरंत भारतीय पासपोर्ट जारी करने का निर्देश भी दिया है। न्यायमूर्ति सचिन दत्ता की एकल पीठ ने दो फरवरी को यांगचेन द्राकमार्ग्यापोन की एक रिट याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि उनका मामला नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 3(1)(क) के दायरे में आता है। यह कानून 26 जनवरी 1950 से एक जुलाई 1987 के बीच भारत में जन्मे हर व्यक्ति को जन्म के आधार पर भारतीय नागरिकता प्रदान करता है।
वंश के आधार पर तिब्बती शरणार्थी याचिकाकर्ता यांगचेन का जन्म 15 मई 1966 को हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में हुआ था। उनके जन्म का स्थान और तारीख आधिकारिक दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से दर्ज भी है। इस पर अदालत ने पाया कि उन पर कानून के तहत नागरिकता से वंचित करने वाली कोई भी अयोग्यता लागू नहीं होती है। यह मामला लंबे समय तक 'नागरिक विहीनता' की एक असाधारण कहानी है। याचिकाकर्ता 1997 में स्विट्जरलैंड चली गई थीं, जहां स्विस अधिकारियों ने उन्हें केवल यात्रा के लिए एक खास तरह का 'विदेशियों के लिए पासपोर्ट' जारी किया था। साल 2014 में इस दस्तावेज की अवधि समाप्त होने के बाद स्विस अधिकारियों ने इसे नवीनीकृत करने से मना कर दिया और उन्हें भारत से पासपोर्ट प्राप्त करने को कहा। जब उन्होंने भारतीय अधिकारियों से संपर्क किया तो उनको बताया गया कि उनको पासपोर्ट नहीं मिल सकता।
केंद्र सरकार ने तर्क दिया था कि विदेशी यात्रा दस्तावेज रखना स्वेच्छा से विदेशी नागरिकता लेने जैसा है। लेकिन अदालत ने इस दलील को नहीं माना और उसे सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे अस्थायी यात्रा दस्तावेजों से भारतीय नागरिकता समाप्त नहीं होती है।
यह फैसला भारत में, विशेषकर धर्मशाला में रह रहे ऐसे लगभग एक लाख तिब्बती शरणार्थियों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, जो दशकों से अपनी नागरिक पहचान को लेकर कानूनी अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं।Nअदालत के फैसले से साफ हो गया है कि किसी शरणार्थी के दूसरे वंश के होने के बावजूद, कानून के तहत मिलने वाले नागरिकता के अधिकार को प्रशासनिक देरी या नौकरशाही के इनकार से खत्म नहीं किया जा सकता।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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