सुप्रीम कोर्ट का गुरुग्राम में मासूम से दरिंदगी पर कड़ा रुख, सीबीआई-एसआईटी जांच की मांग पर डीजीपी को नोटिस
हरियाणा पुलिस की जांच को बताया 'परेशान करने वाला', गुरुग्राम पुलिस कमिश्नर 25 मार्च को रिकॉर्ड के साथ तलब

नई दिल्ली। गुरुग्राम में चार वर्षीय मासूम बच्ची के साथ हुई हैवानियत के मामले में देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा पुलिस की ढुलमुल जांच और कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और हरियाणा सरकार को नोटिस जारी किया है। अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया है कि गुरुग्राम के पुलिस आयुक्त और मामले के जांच अधिकारी आगामी 25 मार्च को सभी मूल रिकॉर्ड के साथ व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में हाजिर हों।
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने पीड़िता के माता-पिता द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए पुलिसिया कार्रवाई पर कई सवाल खड़े किए हैं। कोर्ट ने कहा कि माता-पिता के हलफनामे से पता चलता है कि बच्ची से जिस तरह पूछताछ की गई, वह 'बेहद परेशान करने वाली' है। पीठ ने एडवोकेट जनरल को निर्देश दिया कि राज्य में कार्यरत सक्षम महिला आईपीएस अधिकारियों के नाम सुझाएं, जिन्हें जांच सौंपी जा सके। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायालय इस बात से हैरान है कि संवेदनशील मामलों में पुलिस का रवैया इतना लापरवाह कैसे हो सकता है। हम इस मामले की तह तक जाएंगे।
मुकुल रोहतगी की दलीलें: कानून की उड़ीं धज्जियां
पीड़िता की ओर से पेश दिग्गज वकील मुकुल रोहतगी ने अदालत में पुलिस की कार्यप्रणाली की पोल खोलकर रख दी। उन्होंने कि जब मजिस्ट्रेट के सामने मासूम का बयान दर्ज हो रहा था, तब कानून की धज्जियां उड़ाते हुए आरोपी को बगल के वेटिंग रूम में बिठाया गया था। जांच अधिकारियों ने पीड़ित परिवार पर एफआईआर वापस लेने का अनुचित दबाव बनाया। रोहतगी ने अदालत को बताया कि मामले की महिला जांच अधिकारी खुद पहले एक रिश्वत कांड में आरोपी रह चुकी हैं।
मासूम को काटने पड़े दफ्तरों के चक्कर
अदालत को सूचित किया गया कि एक छोटी बच्ची, जो पहले ही सदमे में थी, उसे कई दिनों तक पुलिस स्टेशन, बाल कल्याण समिति (CWC), मजिस्ट्रेट कोर्ट और अस्पतालों के चक्कर कटवाए गए। यह पोस्को अधिनियम के उन प्रावधानों का उल्लंघन है, जो पीड़ित को मानसिक प्रताड़ना से बचाने की बात करते हैं।
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याचिकाकर्ताओं ने हरियाणा पुलिस पर अविश्वास जताते हुए मामले की जांच सीबीआई या किसी स्वतंत्र एसआईटी से कराने की गुहार लगाई है। अब सबकी नजरें 25 मार्च की सुनवाई पर टिकी हैं, जहाँ गुरुग्राम पुलिस को अपनी विफलताओं का जवाब देना होगा। सुप्रीम कोर्ट सीबीआई या एसआईटी जांच के आदेश जारी कर सकता है।
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लेखक के बारे में
ओ.पी. पाल पिछले साढ़े तीन दशकों से पत्रकारिता में सक्रिय एक प्रतिष्ठित नाम हैं। भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त (P.I.B. Accredited) वरिष्ठ पत्रकार श्री पाल ने लंबे समय तक लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही के साथ-साथ गृह, रक्षा और कृषि जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की नेशनल ब्यूरो स्तर पर रिपोर्टिंग की है।
अमर उजाला और दैनिक जागरण से पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले श्री पाल ने 'शाह टाइम्स' में न्यूज़ एडिटर और 'हरिभूमि' (दिल्ली) में वरिष्ठ संवाददाता के रूप में लंबी सेवाएं दी हैं। राजनीति विज्ञान और कृषि के विशेषज्ञ होने के साथ-साथ वे 'साहित्य रत्न' से भी विभूषित हैं। वर्तमान में वे एक स्वतंत्र पत्रकार और स्तंभकार के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

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