तिरुपति प्रसादम विवाद : सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका खारिज की, प्रशासनिक और एसआईटी जांच एक साथ चलेगी
नई दिल्ली। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा दायर एक रिट याचिका खारिज कर दी। इस याचिका में आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा बनाई गई एक सदस्यीय समिति को चुनौती दी गई थी। यह कमेटी तिरुमाला लड्डुओं के लिए कथित तौर पर मिलावटी घी की सप्लाई से जुड़े मामले में दोषी अधिकारियों के खिलाफ सही डिपार्टमेंटल एक्शन की सिफारिश के लिए है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा कराई जा रही प्रशासनिक जांच और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) की जांच अलग-अलग दायरे में काम करती हैं। इसलिए दोनों प्रक्रियाएं साथ-साथ चल सकती हैं। याचिका में कहा गया था कि एक सदस्यीय समिति की जांच, सुप्रीम कोर्ट के आदेश से गठित एसआईटी की जांच में दखल दे रही है। यह मामला तिरुपति मंदिर में प्रसाद के रूप में दिए जाने वाले लड्डुओं में इस्तेमाल हुए घी में मिलावट के आरोपों से जुड़ा है।
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याचिका खारिज करते हुए पीठ ने साफ कहा कि अदालत की चिंता सिर्फ इतनी है कि दोनों जांच प्रक्रियाओं में कोई टकराव या दोहराव न हो। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची भी शामिल थे। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास हस्तक्षेप की मांग करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है। अपने आदेश में, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि दोनों प्रोसेस कानून के अनुसार सख्ती से जारी रहें। सुनवाई के दौरान आंध्र प्रदेश सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि यह याचिका पूरी तरह दुर्भावना से दायर की गई है, ताकि विभागीय कार्रवाई को रोका जा सके। तिरुपति मंदिर के लड्डू में कथित मिलावट के पीछे मुख्य लोगों की पहचान करने के लिए समिति बनाने का फैसला 3 फरवरी को मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू की अध्यक्षता में हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में लिया गया था। सरकार ने समिति को 45 दिनों के भीतर रिपोर्ट देने को कहा है। समिति यह देखेगी कि प्रशासनिक स्तर पर कहां चूक हुई, क्या फैसले नियमों के अनुसार और सावधानी से लिए गए थे, किन अधिकारियों की क्या जिम्मेदारी बनती है और उनके खिलाफ क्या अनुशासनात्मक या प्रशासनिक कार्रवाई होनी चाहिए। समिति का दायरा केवल प्रशासनिक पहलुओं तक सीमित रहेगा। इससे पहले 4 अक्टूबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने लड्डू में कथित मिलावट की जांच एक स्वतंत्र एसआईटी को सौंपी थी, जो केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक की निगरानी में काम कर रही थी। जांच पूरी होने के बाद सीबीआई की अगुवाई वाली एसआईटी ने 23 जनवरी 2026 को नेल्लोर स्थित एंटी करप्शन ब्यूरो की अदालत में अंतिम चार्जशीट दाखिल की। साथ ही कुछ अधिकारियों के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की सिफारिश भी की। चार्जशीट में आईसीएआर के राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है।
संस्थान ने जुलाई 2024 में टैंकर से लिए गए चार सीलबंद घी के नमूनों की जांच की थी। लैब रिपोर्ट में सैंपल में लार्ड या जानवरों की चर्बी नहीं मिली। हालांकि, जांच करने वालों ने यह नतीजा निकाला कि घी में वेजिटेबल ऑयल और लैब एस्टर का कॉकटेल मिलाया गया था, जिसे डेयरी पैरामीटर की केमिकल नकल करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। उधर, प्रवर्तन निदेशालय ने भी इस मामले में धन शोधन निवारण कानून के तहत मामला दर्ज किया है। एजेंसी ने सीबीआई की चार्जशीट के आधार पर जांच शुरू की है। सूत्रों के अनुसार, इसमें हवाला के जरिये लेनदेन के आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि निजी डेयरी कंपनियों और बिचौलियों ने घी के टेंडर और गुणवत्ता मंजूरी से जुड़े टीटीडी अधिकारियों को प्रभावित करने के लिए हवाला चैनलों के माध्यम से रिश्वत पहुंचाई। प्रवर्तन निदेशालय अब पैसों के पूरे लेनदेन की कड़ी और कथित हवाला नेटवर्क की भूमिका की जांच करेगा।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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