पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में अगर किसी एक शहर ने बार-बार राष्ट्रीय विमर्श को दिशा दी है, तो वह है मेरठ। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर बड़े चुनावी अभियान से पहले मेरठ को मंच के रूप में चुनते रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर मेरठ ही क्यों? क्या यह केवल संयोग है, या इसके पीछे गहरी राजनीतिक रणनीति काम करती है?
मेरठ भौगोलिक दृष्टि से पश्चिमी उत्तर प्रदेश का केंद्रीय शहर है। आसपास के जिलों-बागपत, मुज़फ्फरनगर, शामली, सहारनपुर, बिजनौर और बुलंदशहर पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है। यह इलाका जाट बहुल माना जाता है और यहां का सामाजिक समीकरण प्रदेश की सत्ता का गणित बदलने की क्षमता रखता है। पिछले कुछ वर्षों में किसान आंदोलन के कारण जाट मतदाताओं का एक वर्ग भाजपा से दूरी बनाता दिखा। ऐसे में मेरठ से विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और जनसभा आयोजित करना केवल प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश का सुविचारित माध्यम भी है।
दिल्ली-मेरठ नमो भारत रैपिड रेल और मेरठ मेट्रो जैसी परियोजनाओं का लोकार्पण विकास की उपलब्धि के साथ-साथ सामाजिक पुनर्संतुलन का संकेत भी देता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ‘डबल इंजन’ सरकार की उपलब्धियों को पश्चिमी यूपी में ठोस आधार के रूप में स्थापित करना चाहती है। बेहतर संपर्क व्यवस्था, उद्योग और रियल एस्टेट को बढ़ावा देने वाली परियोजनाएं सीधे शहरी और अर्ध-शहरी मतदाताओं को प्रभावित करती हैं। साथ ही मंच पर जाट नेता और केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी की उपस्थिति व्यापक सामाजिक संतुलन का संकेत मानी जा रही है। यह संदेश देने की कोशिश है कि क्षेत्रीय असंतोष को संवाद और साझेदारी से दूर किया जा सकता है। भाजपा के लिए यह रणनीति केवल विकास की चर्चा नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वास की पुनर्स्थापना का प्रयास भी है।
यह पहली बार नहीं है जब मेरठ से चुनावी शंखनाद हुआ हो। 2014 में यहीं से लोकसभा चुनाव अभियान की शुरुआत हुई थी, जिसने राष्ट्रीय राजनीति का रुख बदल दिया। इसके बाद 2019 और 2024 में भी मेरठ ने भाजपा के चुनावी अभियान में केंद्रीय भूमिका निभाई। मेरठ का चयन प्रतीकात्मक भी है। 1857 की क्रांति की पृष्ठभूमि, मजबूत किसान परंपरा और सामुदायिक नेतृत्व की परंपरा इस शहर को राजनीतिक रूप से ऊर्जावान बनाती है। यहां की सभा केवल स्थानीय भीड़ नहीं जुटाती, बल्कि पूरे पश्चिमी यूपी में संदेश प्रसारित करती है।
जाट बैल्ट का गणित
पश्चिमी यूपी की राजनीति में जाट समुदाय की निर्णायक भूमिका रही है। अतीत में राष्ट्रीय लोकदल और अन्य क्षेत्रीय दलों का प्रभाव यहां मजबूत रहा है। भाजपा के लिए यह क्षेत्र 2014 और 2019 में बड़ी सफलता का आधार बना, लेकिन किसान आंदोलन के बाद समीकरण बदले। ऐसे में मेरठ से विकास परियोजनाओं का उद्घाटन कर यह संकेत देने की कोशिश है कि केंद्र और राज्य सरकार क्षेत्रीय आकांक्षाओं के प्रति संवेदनशील हैं। यदि भाजपा जाट मतदाताओं का विश्वास दोबारा अर्जित कर लेती है, तो 2027 के विधानसभा चुनाव में इसका व्यापक असर पड़ सकता है। राजनीति में प्रतीक और मनोविज्ञान का महत्व कम नहीं होता। मेरठ की विशाल रैली शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनती है। बड़ी भीड़ केवल समर्थन का संकेत नहीं देती, बल्कि संगठनात्मक मजबूती और कार्यकर्ताओं के मनोबल को भी बढ़ाती है। इसके अलावा, पश्चिमी यूपी से उठी आवाज़ पूर्वी और मध्य यूपी तक राजनीतिक ऊर्जा पहुंचाने का काम करती है। इस दृष्टि से मेरठ केवल एक शहर नहीं, बल्कि अभियान की प्रयोगशाला है जहां रणनीति की दिशा तय होती है। नरेंद्र मोदी द्वारा बार-बार मेरठ को चुनावी अभियान की शुरुआत के लिए चुनना एक सुविचारित राजनीतिक निर्णय प्रतीत होता है। पश्चिमी यूपी की सामाजिक संरचना, जाट समुदाय का प्रभाव, ऐतिहासिक प्रतीकात्मकता और भौगोलिक केंद्रीयता ये सभी कारक मेरठ को विशेष बनाते हैं।
विकास परियोजनाओं के उद्घाटन के साथ जब राजनीतिक संदेश जोड़ा जाता है, तो वह केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं रह जाता, बल्कि व्यापक चुनावी रणनीति का हिस्सा बन जाता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि मेरठ से दिया गया संदेश पश्चिमी यूपी के मतदाताओं के मन में कितना गहरा असर छोड़ पाता है।
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