यूपी पुलिस की मनमानी पर हाईकोर्ट सख्त: 14 एसीपी तलब, शांतिभंग में 493 लोगों को जेल भेजने पर मांगा जवाब
मूल अधिकारों के हनन का आरोप; जस्टिस जेजे मुनीर के निर्देश पर जांच शुरू, जेल भेजे जाने वालों में कई बुजुर्ग भी शामिल

लखनऊ/आगरा। उत्तर प्रदेश में पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू होने के बाद पुलिस को मिली 'मजिस्ट्रेट' की शक्तियों के कथित दुरुपयोग पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली और मनमानी पर सवाल उठाते हुए हाईकोर्ट के प्रशासनिक न्यायमूर्ति जेजे मुनीर के निर्देश पर गठित जांच समिति ने आगरा कमिश्नरेट के 14 एसीपी (सहायक पुलिस आयुक्त) को व्यक्तिगत रूप से तलब किया है। विशेष न्यायाधीश ने इन अधिकारियों से लिखित स्पष्टीकरण मांगा है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की गाइडलाइंस का उल्लंघन कर शांतिभंग के आरोपियों को मुचलके पर रिहा करने के बजाय सीधे जेल क्यों भेजा गया ?
59 दिन में 493 लोग सलाखों के पीछे, यूपी पुलिस की कार्यशैली पर सवाल
जांच में सामने आए आंकड़े चौंकाने वाले हैं। मात्र 59 दिनों (1 जनवरी से 28 फरवरी 2026) के भीतर पुलिस ने मजिस्ट्रेट शक्तियों का उपयोग करते हुए 493 लोगों को शांतिभंग (धारा 126/135) की आशंका में जेल भेज दिया। इनमें कई बेगुनाह बुजुर्ग भी शामिल थे। कोर्ट ने सख्त लहजे में पूछा कि जब इन धाराओं में जमानत और मुचलके का स्पष्ट प्रावधान है, तो आम जनता के मूल अधिकारों का हनन कर उन्हें जेल क्यों भेजा गया? यह मामला पूरे प्रदेश की पुलिसिंग व्यवस्था और कार्यपालक मजिस्ट्रेट के रूप में पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
ये भी पढ़ें ईरान ने क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा बनाने का प्रस्ताव रखा, युद्ध खत्म करने के लिए दोहराई शर्तें अधिवक्ताओं की शिकायत पर बैठी जांच, मजिस्ट्रेट की तरह सोचने की नसीहत
पिछले दिनों प्रशासनिक न्यायमूर्ति जेजे मुनीर से अधिवक्ताओं ने लिखित शिकायत की थी कि पुलिस अधिकारी अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर रहे हैं और मामूली विवादों में भी लोगों को जेल भेज देते हैं। यहां तक कि बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों को भी पाबंद करने की घटनाएं सामने आई हैं। सोमवार को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने नसीहत दी कि एसीपी अपनी कोर्ट में 'पुलिस अधिकारी' की तरह नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष 'मजिस्ट्रेट' की तरह सोचें और फैसला लें।
पुलिस का तर्क बनाम जनता के अधिकार
एक ओर पुलिस अधिकारियों का तर्क है कि इस तरह की सख्त कार्रवाई से बलवे और जानलेवा हमले जैसी घटनाओं में कमी आई है और अपराधियों में खौफ बढ़ा है। वहीं, दूसरी ओर कानून के जानकारों का कहना है कि शांतिभंग जैसी धाराओं में जेल भेजना सीधे तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन है। फिलहाल, इस प्रकरण की विस्तृत रिपोर्ट हाईकोर्ट भेजी जाएगी, जिसके बाद पूरे उत्तर प्रदेश में पुलिस की इन मजिस्ट्रेट शक्तियों के उपयोग को लेकर नए और कड़े दिशा-निर्देश जारी हो सकते हैं।
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