"NIT की नई रिसर्च: अब हादसों और युद्ध में नहीं बहेगा खून.. खून बहने से रोकेगा ‘स्टॉपब्लीड’
जानें कैसे यह स्वदेशी आविष्कार हजारों जिंदगियां बचाने में मददगार साबित होगा
नई दिल्ली। भारत के शिक्षण संस्थान, युद्ध में जख्मी हुए देश के सैनिकों का खून बहने से रोकेंगे। दरअसल, एनआईटी के छात्रों और फैकल्टी ने इससे जुड़ी एक महत्वपूर्ण रिसर्च पूरी की है। सैन्य अभियानों के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव को तुरंत नियंत्रित करने के लिए की गई इस रिसर्च को ‘स्टॉपब्लीड’ नाम दिया गया है। यहां खास बात यह है कि ‘स्टॉपब्लीड’ रिसर्च शिक्षण संस्थान की प्रयोगशाला से निकलकर वास्तविक उपचार केंद्र तक पहुंच रही है। यह नवाचार राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी), राउरकेला ने किया है। यह उत्पाद सड़क दुर्घटनाओं, गोली लगने, विस्फोटक चोटों, औद्योगिक दुर्घटनाओं, गहरे चाकू के घावों तथा अन्य गंभीर या जीवन-घातक ट्रॉमा स्थितियों में होने वाले तीव्र रक्तस्राव को शीघ्र नियंत्रित करने में सहायक है। गौरतलब है कि अधिकांश सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली अनेक मौतों का कारण भी अधिक खून बह जाना होता है। यानी समय रहते खून बहने को नियंत्रित न कर पाने के कारण मौत होती है।
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संस्थान का कहना है कि भारत में ट्रॉमा देखभाल एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में एनआईटी राउरकेला द्वारा विकसित स्टॉपब्लीड एक बड़ी उपलब्धि है। स्टॉपब्लीड को सेंट्रल ड्रग्स स्टैण्डर्ड कंट्रोल आर्गेनाईजेशन से क्लास सी मेडिकल डिवाइस के रूप में स्वीकृति मिल चुकी है। यह शैक्षणिक अनुसंधान को वास्तविक जीवन रक्षक चिकित्सा तकनीक में परिवर्तित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह नवाचार पाउडर और पेलेट (छोटे दानों) के रूप में उपलब्ध एक उन्नत रक्तस्राव नियंत्रण समाधान है। इसे सड़क दुर्घटनाओं, सैन्य चोटों तथा आपातकालीन प्राथमिक उपचार की स्थितियों में उपयोग के लिए खासतौर पर डिजाइन किया गया है। इसकी शेल्फ लाइफ तीन वर्ष है। कमरे के तापमान पर (रूम टेम्परेचर) के साथ, इसे चिकित्सा पेशेवरों तथा गैर-चिकित्सीय प्राथमिक उपचारकर्ताओं द्वारा भी आसानी से डिजाइन किया गया है। नैनोफाइब्रस एग्रीगेट तकनीक पर आधारित यह उत्पाद रक्त प्लाज्मा को शीघ्र अवशोषित करता है। रक्त कोशिकाओं को उच्च सतह क्षेत्र वाले रेशेदार जाल में फंसा लेता है। इससे शरीर की प्राकृतिक थक्का बनने की प्रक्रिया तेज होती है और घाव पर मजबूत हाइड्रोजेल सील बनती है। इससे खून निकलना बंद हो जाता है। इसे जैव प्रौद्योगिकी और मेडिकल इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर देवेंद्र वर्मा और उनके शोध ग्रेजुएट साबिर हुसैन द्वारा विकसित किया गया था। बाद में इसका हस्तांतरण साबिर हुसैन के नेतृत्व वाले स्टार्टअप मिराकल्स मेड सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड को उत्पादन, वितरण और क्षेत्रीय उपयोग के लिए किया गया।
एनआईटी राउरकेला के निदेशक प्रो. के. उमामहेश्वर राव ने कहा कि यह उत्पाद आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को सशक्त बनाने की क्षमता रखता है। वहीं शोधकर्ता प्रो. देवेंद्र वर्मा ने कहा, “एनआईटी राउरकेला में हमारी प्रयोगशाला से स्टॉपब्लीड को सेंट्रल ड्रग्स स्टैण्डर्ड कंट्रोल आर्गेनाईजेशन से स्वीकृत मिलना अत्यंत संतोषजनक है। यह सैन्य परिस्थितियों या भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आपातकालीन स्थितियों के दौरान प्राथमिक उपचारकर्ताओं को रक्तस्राव शीघ्र नियंत्रित करने और जीवन बचाने में मदद कर सकता है। उन्होंने कहा कि मैं आशा करता हूं कि यह उपलब्धि अधिक छात्रों को उद्यमिता अपनाने और उत्कृष्ट शोध को उपयोगी स्वास्थ्य समाधानों में परिवर्तित करने के लिए प्रेरित करेगी। भारत को आयात पर निर्भरता कम करने, लागत घटाने और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप तकनीक विकसित करने के लिए अधिक स्वास्थ्य स्टार्टअप्स की आवश्यकता है।”
अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के मुताबिक, इस नवाचार का कई प्रयोगशाला एवं पशुओं पर परीक्षण किया गया है, जिनमें संतोषजनक परिणाम प्राप्त हुए। इसे बेंगलुरु स्थित संजय गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉमा एंड ऑर्थोपेडिक्स के सहयोग से प्रथम-मानव अध्ययन के माध्यम से वास्तविक नैदानिक वातावरण में भी परखा गया। एनआईटी राउरकेला के पूर्व छात्र साबिर हुसैन के मुताबिक, चयनित क्लिनिकल संस्थानों में सीमित स्तर पर स्टॉपब्लीड की तैनाती शुरू कर दी गई है। इस जीवन रक्षक नवाचार को भारत की आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में व्यापक रूप से उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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