संपादकीय: कोटद्वार का 'दीपक' और नफरत की आंधी, क्या एक नाम और एक पहचान इतनी भारी पड़ गई कि हम इंसानियत भूल गए ?
उत्तराखंड के शांत कहे जाने वाले शहर कोटद्वार से पिछले कुछ दिनों में जो तस्वीरें और खबरें सामने आईं, वे केवल एक दुकान के नाम 'बाबा' के विवाद तक सीमित नहीं हैं। यह विवाद हमारी सामाजिक बनावट और आपसी भाईचारे की परीक्षा ले रहा है। इस पूरी घटना के केंद्र में एक शख्स है— दीपक कश्यप।
हैरानी और दुख की बात यह है कि शांति की अपील करने वाले और आपसी सहयोग की बात करने वाले व्यक्ति को ही भीड़ के गुस्से का शिकार होना पड़ा। हिंदू संगठनों द्वारा दीपक कश्यप के साथ की गई अभद्रता यह सवाल खड़ा करती है कि क्या हम इतने असहिष्णु हो चुके हैं कि अपने ही समुदाय के उस व्यक्ति को बर्दाश्त नहीं कर सकते जो दूसरे धर्म के व्यक्ति के प्रति संवेदना रखता है?
दुकान का नाम क्या होगा, यह तय करने का अधिकार कानून और नियमों को है, न कि सड़क पर प्रदर्शन करने वाली भीड़ को। यदि 'बाबा' नाम से किसी की भावनाएं आहत हो रही थीं, तो उसका समाधान बातचीत या प्रशासन के माध्यम से होना चाहिए था। लेकिन जिस तरह से इसे एक सांप्रदायिक रंग दिया गया और बाहरी जिलों से भीड़ जुटाई गई, उसने कोटद्वार की शांति को दांव पर लगा दिया।
समाज को आज नारों की नहीं, बल्कि 'दीपक' जैसे हौसलों की ज़रूरत है। राहुल गांधी का ट्वीट हो या भीम आर्मी का समर्थन, इस मामले का राजनीतिकरण होना स्वाभाविक है, लेकिन धरातल पर रहने वाले लोगों को यह समझना होगा कि नफरत की आग में झुलसने वाला पहला घर पड़ोसी का नहीं, बल्कि इंसानियत का होता है।
पुलिस प्रशासन ने मुकदमे दर्ज किए हैं, फ्लैग मार्च हो रहा है, यह अच्छी बात है। लेकिन असली 'फ्लैग मार्च' हमारे विचारों में होना चाहिए। हमें यह तय करना होगा कि क्या हम एक ऐसे समाज में रहना चाहते हैं जहाँ नाम पर विवाद हो, या ऐसे समाज में जहाँ दीपक जैसे युवा एक-दूसरे का हाथ थामकर खड़े हों।
क्या एक बीमार और बुजुर्ग मुस्लिम पड़ौसी के पक्ष में खड़े होते ही दीपक कश्यप हिन्दू ही नहीं रहा ?, हिंदुत्व के तथाकथित ठेकेदारों का निशाना बन गया, जो आज हिंदुत्व का प्रमाणपत्र बांटते फिर रहे है ?, दीपक की माँ को भी गन्दी गन्दी गालियां दी गई, उसके जिम को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई, आज ज़रूरत है ऐसे उपद्रवी तत्वों के खिलाफ समाज को खड़ा होने की,चाहे हिन्दू हो या मुसलमान, दोनों में ही ऐसे कट्टरपंथी सोच वाले तत्वों का खुलकर मुकाबला करने की, जो देश के सद्भाव को ख़राब करने की कोशिश कर रहे है।
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लेखक के बारे में
रॉयल बुलेटिन के संस्थापक एवं मुख्य संपादक अनिल रॉयल ने वर्ष 1985 में मात्र 17 वर्ष की आयु से मुज़फ्फरनगर की पावन भूमि से निर्भीक और जनपक्षधर पत्रकारिता का संकल्प लिया। बीते लगभग चार दशकों से वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सशक्त और विश्वसनीय आवाज़ के रूप में पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं।
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