भगवद गीता में यज्ञ का वास्तविक अर्थ: कर्म, सेवा और समाज की भलाई
नई दिल्ली। भगवद गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि जो व्यक्ति बिना यज्ञ के भोजन करता है, वह केवल अन्न नहीं ग्रहण करता बल्कि पाप भी करता है। भगवद गीता में इसका उल्लेख ‘भुज्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्म कारणात्’ के रूप में किया गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यहां भगवान कृष्ण का आशय केवल अग्नि होत्र या हवन से नहीं है, बल्कि यज्ञ की व्यापक परिभाषा को समझाने से है। अग्नि होत्र प्रतिदिन प्रत्येक परिवार में किया जा सकता है, परंतु केवल हवन करना ही यज्ञ नहीं कहा जा सकता। यज्ञ को संसार का सर्वोत्तम कर्म माना गया है।
हर शुभ कार्य और श्रेष्ठ आचरण यज्ञ की श्रेणी में आते हैं। व्यक्ति का कर्मशील जीवन यदि दूसरों के हित में होता है तो वह स्वयं में एक यज्ञ है। तन से हम दूसरों की सेवा कर सकते हैं, सहयोग कर सकते हैं और समाज में सकारात्मक योगदान दे सकते हैं। मन में अच्छे विचार ग्रहण करना भी यज्ञ का एक रूप है।
वाणी से हम ज्ञान का प्रचार-प्रसार कर सकते हैं और प्रेमपूर्वक किसी को सांत्वना दे सकते हैं। समाज का मार्गदर्शन भी वाणी द्वारा ही संभव होता है। अतः वाणी को भी यज्ञ का एक साधन माना गया है।
आध्यात्मिक विद्वानों का मानना है कि जो कुछ हम अपना समझते हैं, वह केवल हमारे लिए नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण प्रकृति का एक अंश है। इसे दूसरों की सेवा में लगाना ही वास्तविक यज्ञ है। यही कारण है कि समाज में किए जाने वाले सभी श्रेष्ठ कार्य यज्ञ की श्रेणी में आते हैं।
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