मिडल ईस्ट संकट: पीएम मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति से की बात; बुनियादी ढांचे पर हमलों की निंदा, शांति और नौवहन की सुरक्षा पर दिया जोर

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में पिछले 22 दिनों से जारी भीषण सैन्य संघर्ष के बीच भारत ने कूटनीतिक सक्रियता बढ़ा दी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शनिवार को ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से टेलीफोन पर विस्तृत बातचीत की। इस दौरान पीएम मोदी ने न केवल क्षेत्र में बिगड़ते हालात पर चिंता जताई, बल्कि महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे (Infrastructure) पर हो रहे हमलों की कड़े शब्दों में निंदा भी की।
पीएम मोदी का कड़ा रुख: "हमले बर्दाश्त नहीं, सुरक्षित रहें समुद्री मार्ग"
प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के अनुसार, बातचीत के दौरान पीएम मोदी ने स्पष्ट किया कि तेल, गैस और अन्य नागरिक बुनियादी ढांचों पर हमले क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बड़ा खतरा हैं। पीएम के संबोधन के मुख्य बिंदु:
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बुनियादी ढांचे पर प्रहार: मोदी ने हालिया हमलों की निंदा करते हुए कहा कि इससे वैश्विक सप्लाई चेन (आपूर्ति शृंखला) प्रभावित हो रही है।
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समुद्री सुरक्षा: प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय शिपिंग मार्गों और होर्मुज जलडमरूमध्य में 'नौवहन की स्वतंत्रता' (Freedom of Navigation) सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया।
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भारतीयों की सुरक्षा: ईरान में रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा के लिए पीएम ने ईरानी सहयोग की सराहना की।
यह 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद दोनों नेताओं के बीच दूसरी टेलीफोनिक वार्ता है। इससे पहले 12 मार्च को भी उनके बीच चर्चा हुई थी।
जयशंकर-अराघची वार्ता: "स्वतंत्र देश एकजुट होकर दबाव बनाएं"
उधर, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी अपने ईरानी समकक्ष अब्बास अराघची से फोन पर लंबी चर्चा की।
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ईरान का पक्ष: अराघची ने अमेरिका और इजराइल के हमलों को 'अवैध' करार देते हुए कहा कि दुनिया के स्वतंत्र देशों को एकजुट होकर हमलावरों पर दबाव बनाना चाहिए। उन्होंने भविष्य में ऐसे हमलों की पुनरावृत्ति न होने की गारंटी भी मांगी।
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भारत का मंत्र: जयशंकर ने दोहराया कि भारत हमेशा से 'संवाद और कूटनीति' (Dialogue and Diplomacy) के जरिए समाधान का समर्थक रहा है। उन्होंने फारस की खाड़ी में शांति बहाली को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य बताया।
रणनीतिक मायने: भारत की 'बैलेंसिंग एक्ट'
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत एक तरफ इजराइल के साथ रणनीतिक साझेदारी रखता है, तो दूसरी तरफ ईरान के साथ ऊर्जा और चाबहार बंदरगाह जैसे हितों के कारण गहरे संबंध बनाए हुए है। पीएम मोदी की यह बातचीत दर्शाती है कि भारत इस युद्ध को फैलने से रोकने के लिए एक 'मध्यस्थ' या 'शांतिदूत' की भूमिका निभाने को तैयार है।
भारत-ईरान रणनीतिक संबंध और युद्ध का असर:
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ऊर्जा सुरक्षा: भारत के लिए ईरान एक महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत रहा है, युद्ध के कारण तेल की कीमतों में उछाल (115 डॉलर+) भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
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चाबहार बंदरगाह: भारत द्वारा संचालित यह पोर्ट मध्य एशिया के लिए 'गेटवे' है। पीएम मोदी की बातचीत इस प्रोजेक्ट की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भी अहम है।
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भारतीय प्रवासी: ईरान में हजारों भारतीय नागरिक और पेशेवर कार्यरत हैं, जिनकी सुरक्षा भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता है।
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