सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सेना में महिलाएं स्थायी कमीशन की हकदार, पेंशन से इनकार को बताया भेदभाव

नई दिल्ली। भारतीय सेना में लैंगिक समानता की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने एक और ऐतिहासिक और मील का पत्थर साबित होने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि महिला अधिकारी सेना में स्थायी कमीशन (Permanent Commission) की पूरी हकदार हैं और उन्हें इससे वंचित रखना उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन और स्पष्ट भेदभाव था।
ये भी पढ़ें ईरान ने क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा बनाने का प्रस्ताव रखा, युद्ध खत्म करने के लिए दोहराई शर्तें कोर्ट ने कहा कि शारीरिक सीमाओं का हवाला देकर महिलाओं को कमांड पोस्ट या स्थायी कमीशन से रोकना न केवल रूढ़िवादिता है, बल्कि यह उनके साथ किया गया 'संस्थागत भेदभाव' था।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन महिला अफसरों की सेवा अवधि (Service) पहले ही समाप्त हो चुकी है, उन्हें भी पेंशन का लाभ दिया जाएगा।
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कोर्ट ने निर्देश दिया है कि उन्हें उन सभी आर्थिक लाभों का हकदार माना जाए जो उनके पुरुष समकक्षों को मिलते हैं। जस्टिस की बेंच ने कहा कि "देश की रक्षा में महिलाओं का योगदान पुरुषों से कम नहीं है। सेना को अपनी मानसिकता बदलनी होगी और योग्यता को एकमात्र पैमाना बनाना होगा।" यह फैसला 2020 के बबीता पुनिया मामले के बाद महिलाओं को मिलने वाली जीत की अगली कड़ी है, जिसमें शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) की महिलाओं को स्थायी कमीशन देने की राह खुली थी।
अब महिलाएं कर्नल और उससे ऊपर के रैंक पर कमांडिंग ऑफिसर के रूप में यूनिट्स का नेतृत्व कर सकेंगी।पदोन्नति (Promotion), ट्रेनिंग और विदेशी पोस्टिंग के मामले में अब महिला और पुरुष अधिकारियों के बीच कोई अंतर नहीं रहेगा।जो महिलाएं कानूनी लड़ाई के दौरान रिटायर हो गईं, उन्हें 'काल्पनिक सेवा' (Notional Service) मानकर पूरी पेंशन दी जाएगी।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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