सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ईसाई या इस्लाम अपनाने पर खत्म होगा SC दर्जा, नहीं मिलेगा विशेष कानून का संरक्षण
जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस ए.वी. अंजारिया की पीठ ने सुनाया निर्णय; पादरी बन चुके व्यक्ति की SC/ST एक्ट के तहत दर्ज FIR को किया रद्द

नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को छोड़कर किसी अन्य धर्म (जैसे ईसाई या इस्लाम) में परिवर्तित होता है, तो वह अपना अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा खो देगा। कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि ईसाई धर्म अपनाने वाला व्यक्ति 'अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989' के तहत मिलने वाले कानूनी संरक्षण और अन्य लाभों का दावा नहीं कर सकता।
पादरी की शिकायत पर आया फैसला
ये भी पढ़ें जब 26/11 हमले का जश्न मनाते-मनाते फूट-फूटकर रोए थे धुरंधर के दो बड़े एक्टर्स, माहौल हो गया था गमगीनयह मामला आंध्र प्रदेश के एक पादरी, चिंथदा आनंद से जुड़ा है, जिन्होंने कुछ लोगों के खिलाफ जातिगत भेदभाव का आरोप लगाते हुए SC/ST एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराया था। जांच में सामने आया कि आनंद पिछले एक दशक से ईसाई धर्म का पालन कर रहे थे और एक पादरी के रूप में सक्रिय थे। सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि धर्म परिवर्तन के साथ ही उनका अनुसूचित जाति वाला स्टेटस खत्म हो गया, इसलिए वे इस विशेष अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज नहीं करा सकते।
कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: सिद्धांतों में जातिवाद का स्थान नहीं
अदालत ने अपने फैसले में मुख्य रूप से तीन बातें स्पष्ट की हैं:
-
संवैधानिक दायरा: केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानने वाले व्यक्ति ही अनुसूचित जाति की श्रेणी में आते हैं। अन्य धर्म अपनाने पर व्यक्ति इस श्रेणी से बाहर हो जाता है।
-
धार्मिक सिद्धांत: कोर्ट ने कहा कि चूंकि ईसाई और इस्लाम जैसे धर्मों में सैद्धांतिक रूप से जातिगत भेदभाव का अस्तित्व नहीं माना जाता, इसलिए धर्मांतरण के बाद SC स्टेटस स्वतः अमान्य हो जाता है।
-
पुराना प्रमाण पत्र बेकार: पीठ ने साफ किया कि यदि किसी के पास पुराना जाति प्रमाण पत्र है भी, तो वह ईसाई बनने के बाद उसे कानूनी संरक्षण दिलाने में काम नहीं आएगा।
पादरी के रूप में सक्रियता बनी आधार
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड्स का हवाला देते हुए कहा कि अपीलकर्ता न केवल ईसाई बन चुके थे, बल्कि वे पादरी के रूप में रविवार की प्रार्थनाएं भी संपन्न कराते थे। ऐसे में उन्हें अनुसूचित जाति का सदस्य मानकर विशेष अधिनियम का लाभ देना कानूनन उचित नहीं है। यह फैसला आने वाले समय में धर्मांतरण और आरक्षण से जुड़े कई कानूनी विवादों के लिए नजीर साबित होगा।
रॉयल बुलेटिन से जुड़ें:
देश-प्रदेश की ताज़ा ख़बरों को सबसे पहले पढ़ने के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल को फॉलो करें:
आपको यह खबर कैसी लगी? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर दे। आपकी राय रॉयल बुलेटिन को और बेहतर बनाने में बहुत उपयोगी होगी।
संबंधित खबरें
लेखक के बारे में
रविता ढांगे 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज़ एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और डिजिटल न्यूज़ डेस्क के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने अपने पेशेवर करियर की शुरुआत 'समाचार टुडे' से की थी, जहाँ उन्होंने डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों और न्यूज़ ऑपरेशन्स के बुनियादी सिद्धांतों को सीखा।
रविता ढांगे की सबसे बड़ी विशेषता उनकी मजबूत तकनीकी पृष्ठभूमि है; उन्होंने BCA, PGDCA और MCA (Master of Computer Applications) जैसी उच्च डिग्रियां प्राप्त की हैं। उनकी यह तकनीकी विशेषज्ञता ही 'रॉयल बुलेटिन' को डिजिटल रूप से सशक्त बनाती है। वर्ष 2022 से संस्थान का अभिन्न हिस्सा रहते हुए, वे न केवल खबरों के संपादन में निपुण हैं, बल्कि न्यूज़ एल्गोरिदम और डेटा मैनेजमेंट के जरिए खबरों को सही दर्शकों तक पहुँचाने में भी माहिर हैं। वे पत्रकारिता और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) के बेहतरीन संगम का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिससे पोर्टल की डिजिटल रीच और विश्वसनीयता में निरंतर वृद्धि हो रही है।

टिप्पणियां