टीएमयू में हास्य-व्यंग्य की महफिल, शैलेश लोढ़ा ने श्रोताओं को किया मंत्रमुग्ध

मुरादाबाद। तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद में आयोजित भव्य कवि सम्मेलन में हास्य-व्यंग्य, वीर रस, श्रृंगार और सामाजिक सरोकारों का अद्भुत संगम देखने को मिला। कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण रहे प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्यकार, लेखक और अभिनेता शैलेश लोढ़ा, जिन्होंने अपनी ओजपूर्ण और रोचक प्रस्तुति से हजारों छात्र-छात्राओं और अतिथियों को देर रात तक बांधे रखा।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन और माल्यार्पण के साथ हुआ। इसके बाद कवियों की प्रस्तुतियों का सिलसिला शुरू हुआ, जिसने पूरे वातावरण को काव्यमय बना दिया। मंच संचालन व्यंग्यकार गोविंद राठी ने किया, जबकि अध्यक्षता शैलेश लोढ़ा ने संभाली।
शैलेश लोढ़ा ने अपनी चर्चित कविता “जिंदगी मुझे तुझसे प्यार है” के माध्यम से आम आदमी के संघर्ष, पारिवारिक जिम्मेदारियों और जीवन के यथार्थ को भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा—
“बच्चों के टूटे खिलौनों को कितनी बार जोड़ पाऊंगा,
बीबी की फटी साड़ी में से झांकेंगे सपने,
आखिर वही तो हैं अपने…
भले ही हर दिन बोझ हो और खुद पर उधार है,
तू जैसी भी है जिंदगी मुझे तुझसे प्यार है।”
उन्होंने भारतीय परिवार व्यवस्था और संस्कारों पर जोर देते हुए कहा कि जिस घर में बुजुर्ग नहीं होते, वह घर केवल मकान बनकर रह जाता है।
लोढ़ा ने समाज में गिरती नैतिकता और फिल्मों में बढ़ती अश्लीलता पर भी तीखा व्यंग्य किया। उन्होंने कहा कि कलम की जिम्मेदारी समाज को दिशा देने की होती है और साहित्यकारों को अपनी मर्यादा बनाए रखनी चाहिए।
कार्यक्रम में वीर रस के कवि अशोक चारण ने अपनी ओजस्वी वाणी से देशभक्ति का जोश भर दिया। उनकी प्रभावशाली प्रस्तुति और सशक्त उच्चारण ने श्रोताओं को रोमांचित कर दिया। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से राष्ट्रप्रेम और साहस का संदेश दिया।
श्रृंगार रस की कवयित्री मनु वैशाली ने अपने मधुर और भावपूर्ण गीतों से वातावरण को प्रेम और सौंदर्य से सराबोर कर दिया। उनकी चर्चित कविता “मोहिनी” पर पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
हास्य कवि चेतन चर्चित ने अपने चुटीले अंदाज में दहेज, जुआ, शराब और अन्य सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया। उन्होंने श्रोताओं को हंसाते हुए गंभीर संदेश भी दिया कि समाज को इन बुराइयों से मुक्त करना आवश्यक है।
गीतकार अभिसार गीता शुक्ल ने प्रेम और विरह की भावनाओं को अपनी रचनाओं के माध्यम से व्यक्त किया। उनकी कविताओं ने युवाओं के दिलों को छू लिया और देर रात तक श्रोताओं को कार्यक्रम से जोड़े रखा।
व्यंग्यकार गोविंद राठी ने समाज और राजनीति की विसंगतियों पर तीखा कटाक्ष किया। उनकी रचनाओं में हास्य के साथ-साथ गहरी सामाजिक सोच भी झलकती रही।
अपने संबोधन में शैलेश लोढ़ा ने भारतीय संस्कृति, परंपराओं और मूल्यों को बचाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने युवाओं से मोबाइल फोन के अत्यधिक उपयोग से बचने और पुस्तकों को अपना सच्चा मित्र बनाने की अपील की।
उन्होंने कहा कि अभिभावकों को अपने बच्चों की तुलना दूसरों से नहीं करनी चाहिए, क्योंकि हर व्यक्ति की अपनी अलग क्षमता और पहचान होती है।
युवाओं को प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में असफलता आने पर निराश न हों, बल्कि अपने कर्म पर विश्वास रखते हुए आगे बढ़ते रहें।
भारतीय परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने “पैर छूने” की संस्कृति को जीवित रखने की आवश्यकता बताई और कहा कि यही संस्कार हमें हमारी जड़ों से जोड़ते हैं।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति, प्रबंधन के वरिष्ठ सदस्य, शिक्षाविद, प्रशासनिक अधिकारी और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। सभी ने कवियों की प्रस्तुतियों का आनंद लिया और तालियों के माध्यम से उनका उत्साहवर्धन किया।
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