हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: रिश्ते टूटने के बाद बलात्कार के मुकदमे दर्ज करना गलत, आजीवन कारावास की सजा रद्द
प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आजीवन कारावास की सजा रद्द कर कहा कि पश्चिमी विचारों और लिव-इन रिलेशनशिप की अवधारणा के प्रभाव में युवाओं में विवाह के बिना साथ रहने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। न्यायालय ने यह भी कहा कि जब ऐसे संबंध टूटते हैं, तो एफआईआर दर्ज की जाती है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्रा की पीठ ने कहा कि चूंकि कानून महिलाओं के पक्ष में हैं, इसलिए पुरुषों को उन कानूनों के आधार पर दोषी ठहराया जाता है, जो उस समय बनाए गए थे, जब लिव-इन रिलेशनशिप की अवधारणा अस्तित्व में ही नहीं थी।
अभियोजन पक्ष का कहना था, अपीलकर्ता ने शिकायतकर्ता की नाबालिग बेटी को शादी का झांसा देकर बहला-फुसलाकर बैंगलोर ले गया और बाद में उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित किए। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता बालिग थी। न्यायालय ने यह भी पाया कि निचली अदालत ने अस्थि परीक्षण रिपोर्ट पर ठीक से विचार नहीं किया था, जिससे उसकी उम्र लगभग 20 वर्ष साबित हुई थी। पीठ ने यह भी पाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत विद्यालय के रिकॉर्ड किशोर न्याय नियमों के अनुसार दस्तावेजी रूप से मान्य नहीं थे। पीठ ने मुखबिर मां (गवाह-1) द्वारा बताई गई उसकी उम्र में विसंगतियों की ओर भी ध्यान दिलाया। गौरतलब है कि एफआईआर में मां ने उम्र 18-1/2 साल बताई थी। न्यायालय ने पीड़िता (गवाह-2) के आचरण को भी ध्यान में रखा, क्योंकि उसने अपने बयान में स्वीकार किया था कि वह स्वेच्छा से अपना घर छोड़कर अपीलकर्ता के साथ सार्वजनिक परिवहन से गोरखपुर और फिर बैंगलोर गई थी।
कोर्ट ने बताया कि सरकारी बस और ट्रेन सहित सार्वजनिक परिवहन में यात्रा करने के बावजूद उसने किसी भी समय कोई आपत्ति नहीं जताई। वह छह महीने तक बेंगलुरु के एक ऐसे इलाके में अपीलकर्ता के साथ रही जहाँ कई घर थे और उसके साथ उसकी सहमति से शारीरिक संबंध थे। उसने अपने परिवार से तभी संपर्क किया जब अपीलकर्ता ने उसे 6 अगस्त, 2021 को शिकारपुर क्रॉसिंग पर वापस छोड़ दिया। इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने माना कि आईपीसी की धारा 363 और 366 के तहत दोषसिद्धि कानून के अनुसार बिल्कुल अनुचित थी क्योंकि पीड़िता बालिग थी और अपनी मर्जी से भाग गई थी।
बलात्कार के आरोपों और पीओसीएसओ अधिनियम के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पीड़िता बालिग थी, तो पीओसीएसओ अधिनियम की धारा 6 के तहत अपीलकर्ता को दोषी ठहराना भी अनुचित है। आईपीसी की धारा 376 के तहत दोषसिद्धि भी उचित नहीं है, क्योंकि पीड़िता बालिग थी और अपीलकर्ता के साथ छह साल तक उसकी सहमति से संबंध थे। हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को रद्द कर दिया और दोषी की अपील को स्वीकार कर लिया।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।
