शंकराचार्य के बयान से देश में छिड़ी नई बहस, एपस्टीन मामले पर भारत की चुप्पी को लेकर उठाए गंभीर सवाल
प्रयागराज। धर्म और राजनीति के बीच एक ताजा बयान ने पूरे देश के बौद्धिक और सामाजिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। हाल ही में शंकराचार्य ने एक ऐसा बयान जारी किया है जिसने न केवल शासन व्यवस्था बल्कि देश के सूचना तंत्र को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। उन्होंने सीधे तौर पर आरोप लगाया है कि जब पूरी दुनिया में एपस्टीन से जुड़े सनसनीखेज दस्तावेजों को लेकर बहस छिड़ी हुई है, तब भारत में जनता को असल मुद्दों से बेखबर रखा जा रहा है।
शंकराचार्य ने कहा कि वैश्विक स्तर पर चल रही इन महत्वपूर्ण चर्चाओं के बजाय भारतीय जनता को जानबूझकर अन्य मुद्दों में उलझाकर रखा जा रहा है। उन्होंने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि देश में लोगों को कहानी दिखाकर व्यस्त रखा जा रहा है, ताकि उनका ध्यान अंतरराष्ट्रीय स्तर के उन गंभीर घटनाक्रमों पर न जा सके जो भविष्य में व्यापक प्रभाव डाल सकते हैं। उनके अनुसार, यह स्थिति देश के सजग नागरिकों के लिए चिंता का विषय है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे इन खुलासों पर भारत में पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
ये भी पढ़ें सहारनपुर: काली नदी चौकी के पास जली हुई ऑल्टो कार में मिला नरकंकाल, हत्या कर शव जलाने की आशंकाइस बयान के सार्वजनिक होते ही सार्वजनिक विमर्श की दिशा बदल गई है। सोशल मीडिया से लेकर टीवी चैनलों की चर्चाओं तक, यह विषय केंद्र में आ गया है। इस मुद्दे पर जनमानस स्पष्ट रूप से दो हिस्सों में बंटा हुआ नजर आ रहा है। एक वर्ग का मानना है कि शंकराचार्य ने बिल्कुल सही और गंभीर सवाल उठाया है। समर्थकों का तर्क है कि भारत की मुख्यधारा की मीडिया और सार्वजनिक चर्चाओं में उन वैश्विक विषयों को स्थान नहीं मिल रहा है जिनका संबंध व्यापक मानवीय मूल्यों और अपराध के बड़े जाल से है।
वहीं, दूसरी ओर एक बड़ा धड़ा इसे विवादित टिप्पणी करार दे रहा है। विरोधियों का कहना है कि भारत के पास अपनी चुनौतियां और मुद्दे हैं, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मामलों की तुलना स्थानीय सरोकारों से करना उचित नहीं है। आलोचकों के अनुसार, इस तरह के बयानों से जनता के बीच भ्रम की स्थिति पैदा होती है।
बहरहाल, शंकराचार्य की इस टिप्पणी ने सूचनाओं के प्रवाह और जनता की जागरूकता पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आने की भी संभावना है, क्योंकि यह सीधे तौर पर देश की प्राथमिकताओं और सूचना तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है।
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