मौत की राख से खेली गई होली! काशी की ये परंपरा देख दुनिया रह गई हैरान
वाराणसी। मोक्ष की नगरी काशी में आज एक ऐसी अद्भुत और अलौकिक परंपरा का नजारा देखने को मिला, जिसे देख पूरी दुनिया हैरत में पड़ गई। रंगभरी एकादशी के अगले दिन महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर जलती चिताओं के बीच 'मसान होली' खेली गई। इस अनोखी परंपरा में गुलाल की जगह अपनों को खो चुके लोगों की चिता की भस्म (राख) का उपयोग किया गया, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से हजारों की संख्या में लोग पहुंचे।
मान्यता है कि रंगभरी एकादशी के दिन भगवान शिव माता पार्वती का गौना कराकर काशी लौटते हैं और अपने भक्तों के साथ गुलाल से होली खेलते हैं। लेकिन श्मशान में रहने वाले भूत-प्रेत, पिशाच और दृश्य-अदृश्य आत्माएं उनके साथ होली नहीं खेल पातीं। इसलिए, महादेव अगले दिन स्वयं महाश्मशान पहुंचकर अपने इन गणों के साथ चिता भस्म से होली खेलते हैं। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए आज बाबा मसान नाथ की आरती के बाद भक्तों ने एक-दूसरे पर जमकर राख उड़ाई।
मणिकर्णिका घाट पर सुबह से ही हर-हर महादेव के जयघोष गूंजने लगे थे। डमरूओं की गूंज और औघड़-नागा साधुओं के नृत्य ने वातावरण को शिवमय बना दिया। जलती चिताओं के बगल में राख से सराबोर चेहरे जीवन और मृत्यु के बीच के उस सत्य को दर्शा रहे थे, जो केवल काशी में ही संभव है। ढोल-नगाड़ों की थाप पर झूमते भक्तों ने इस संदेश को जीवंत किया कि काशी में मृत्यु भी एक उत्सव है।
विदेशी पर्यटकों के लिए यह दृश्य किसी आश्चर्य से कम नहीं था। चिता की राख से होली खेलते लोगों को देख कई पर्यटक भावुक भी हुए और इस ऐतिहासिक क्षण को अपने कैमरों में कैद किया। प्रशासन ने भारी भीड़ को देखते हुए घाटों पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे। घाट की सीढ़ियों से लेकर गलियों तक बस भस्म और महादेव के भक्तों का रेला ही नजर आ रहा था। काशी की यह मसान होली न केवल एक उत्सव है, बल्कि यह जीवन की नश्वरता और महादेव के प्रति अगाध प्रेम का प्रतीक भी है।
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