गाजियाबाद: डासना जेल के कैदियों ने घोले उम्मीदों के रंग, तैयार किया हर्बल गुलाल
गाजियाबाद। रंगों का त्योहार होली इस बार डासना जेल के बंदियों के लिए केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिखने का जरिया बन गया है। जिला कारागार गाजियाबाद में इन दिनों कैदी हर्बल गुलाल तैयार करने में जुटे हैं। प्रशासन की इस अनोखी पहल से जहां पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिल रहा है, वहीं जेल की सलाखों के पीछे बंद जिंदगियों में भी नई उम्मीदों के रंग घुल रहे हैं।
साढ़े तीन हजार की क्षमता वाली इस जेल में होली को खास बनाने के लिए जेल प्रशासन ने ४० कैदियों की एक विशेष टीम तैयार की है। इन बंदियों को फूलों के अर्क और प्राकृतिक तत्वों से गुलाल बनाने का बाकायदा प्रशिक्षण दिया गया है। जेल परिसर के एक्टिविटी सेंटर में पिछले एक महीने से यह काम युद्धस्तर पर चल रहा है। बाजार में मिलने वाले केमिकल युक्त रंगों के बजाय यहां पूरी तरह त्वचा के लिए सुरक्षित और इको-फ्रेंडली गुलाल तैयार किया जा रहा है, जिसकी खुशबू अब जेल की दीवारों से बाहर तक पहुंचने लगी है।
इस पहल की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सुलभता और किफायती दाम हैं। जहां बाजार में शुद्ध हर्बल गुलाल ८०० से १००० रुपये प्रति किलो तक बिकता है, वहीं जेल में तैयार यह गुलाल मात्र २०० से २५० रुपये प्रति किलो की दर से उपलब्ध है। आम जनता इस गुलाल को जेल परिसर के बाहर बने आउटलेट से सीधे खरीद सकती है। जेल प्रशासन का यह मॉडल न केवल उपभोक्ताओं को सस्ता विकल्प दे रहा है, बल्कि कैदियों के श्रम को भी उचित सम्मान दिला रहा है।
आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में कदम बढ़ाते हुए जेल प्रशासन ने तय किया है कि गुलाल की बिक्री से होने वाला सीधा मुनाफा संबंधित कैदियों के बैंक खातों में भेजा जाएगा। इससे उन्हें रिहाई के बाद अपना नया जीवन शुरू करने में आर्थिक मदद मिलेगी। साथ ही कुल कमाई का १० प्रतिशत हिस्सा बंदी कल्याण कोष में जमा होगा। जेल अधीक्षक सीताराम शर्मा का कहना है कि कारागार को केवल सजा काटने की जगह नहीं, बल्कि सुधार गृह के रूप में विकसित करना उनका लक्ष्य है। उनका मानना है कि यदि बंदी यहां से कोई हुनर सीखकर निकलता है, तो समाज की मुख्यधारा में उसे सम्मानजनक स्थान मिलना आसान हो जाता है।
जेल के भीतर तनाव और अवसाद के माहौल के बीच यह रचनात्मक कार्य कैदियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी वरदान साबित हो रहा है। हर्बल गुलाल की पैकेजिंग में जुटे बंदियों के चेहरों पर झलकता आत्मविश्वास इस बात का प्रमाण है कि रंगों का यह पर्व उनके जीवन के अंधेरे को दूर कर भविष्य को उज्ज्वल बनाने की राह दिखा रहा है।
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