मकर संक्रांति 2026: केवल त्योहार नहीं, बल्कि अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का महासंगम
भारत त्योहारों का देश है, लेकिन मकर संक्रांति का स्थान इन सबमें अत्यंत विशिष्ट है। यह देश के उन गिने-चुने त्योहारों में से है, जो तिथि के बजाय सूर्य की स्थिति (खगोलीय गणना) के आधार पर मनाया जाता है। जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस संक्रमण काल को 'मकर संक्रांति' कहा जाता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि इस पर्व को मनाने के पीछे के गहरे कारण क्या हैं।
1. वैज्ञानिक कारण: उत्तरायण का प्रारंभ
2. आध्यात्मिक एवं पौराणिक महत्व
धर्म ग्रंथों के अनुसार, मकर संक्रांति का दिन देवताओं का 'दिन' शुरू होने का समय है।
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भीष्म पितामह का देह त्याग: महाभारत काल में भीष्म पितामह ने स्वेच्छा से मृत्यु के लिए सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार किया था, क्योंकि माना जाता है कि उत्तरायण में देह त्यागने वाले को मोक्ष प्राप्त होता है।
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शनि देव और सूर्य का मिलन: पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्य देव अपने पुत्र शनि के घर (मकर राशि शनि की राशि है) मिलने जाते हैं। यह पिता-पुत्र के संबंधों में कड़वाहट को खत्म कर प्रेम और सौहार्द बढ़ाने का संदेश देता है।
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गंगा अवतरण: माना जाता है कि इसी दिन मां गंगा, राजा भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए गंगासागर में मिली थीं। इसीलिए आज के दिन गंगा स्नान का विशेष फल बताया गया है।
3. सामाजिक समरसता: खिचड़ी और दान का पर्व
मकर संक्रांति को 'खिचड़ी' के नाम से भी जाना जाता है। चावल, दाल, हल्दी और सब्जियां मिलकर बनी खिचड़ी इस बात का प्रतीक है कि अलग-अलग स्वभाव और पृष्ठभूमि के लोग जब एक साथ मिलते हैं, तो समाज अधिक स्वादिष्ट और सुदृढ़ बनता है। इस दिन गुड़ और तिल का सेवन करना वैज्ञानिक रूप से शरीर को गर्मी देता है और आध्यात्मिक रूप से वाणी में मधुरता लाने का संकल्प है।
4. दान की महिमा
शास्त्रों में कहा गया है कि मकर संक्रांति पर किया गया दान अक्षय (जिसका कभी क्षय न हो) फल देता है। इस दिन ऊनी वस्त्र, कंबल, अन्न और तिल का दान जरूरतमंदों को करना पुण्य का काम माना जाता है। रॉयल बुलेटिन भी इस अवसर पर अपने पाठकों के उज्जवल भविष्य की कामना करता है।
