न्याय की गुहार और सियासी घेरेबंदी के बीच सुलगता पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पीड़ितों को जल्द मिलना चाहिए न्याय !
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दो गांवों—मेरठ के कपसाड़ और ज्वालागढ़—से निकलकर आ रही चीखें केवल दो परिवारों का मातम नहीं हैं, बल्कि यह हमारे सिस्टम की संवेदनहीनता पर एक बड़ा तमाचा हैं। आज जब हम डिजिटल इंडिया और विकास की बातें करते हैं, तब मुजफ्फरनगर का एक नौजवान (सोनू कश्यप) संदिग्ध हालात में जला हुआ मिलता है और कपसाड़ की एक मासूम बेटी (रूबी) अपनी मां की हत्या का खौफनाक मंजर आंखों में लिए बीमारी और सदमे से घर की चारदीवारी में कैद होने को मजबूर है। ये तस्वीरें रोंगटे खड़े करने वाली हैं और यह सवाल पूछने पर मजबूर करती हैं कि क्या आम आदमी की जान इतनी सस्ती हो गई है ?
दूसरी ओर, इन घटनाओं के इर्द-गिर्द जिस तरह की 'सियासी घेरेबंदी' और 'जातीय ध्रुवीकरण' की बिसात बिछाई जा रही है, वह लोकतंत्र के लिए घातक है। पीड़ित परिवार को ढांढस बंधाना हर जनप्रतिनिधि का कर्तव्य है, लेकिन जब संवेदना की आड़ में राजनीति हावी होती है, तो न्याय का मुद्दा पीछे छूट जाता है। प्रशासन द्वारा कैबिनेट मंत्री डॉ. संजय निषाद और राज्यमंत्री नरेन्द्र कश्यप तक को बॉर्डर पर रोकना और गांवों में धारा 163 (BNSS) लागू कर बाहरी लोगों का प्रवेश वर्जित करना यह बता रहा है कि जमीन पर हालात सामान्य नहीं हैं। प्रशासन का 'सियासी पर्यटन' को रोकना सुरक्षा की दृष्टि से सही हो सकता है, लेकिन इस पहरेदारी में पीड़ित परिवार खुद को अकेला और लाचार महसूस न करे, इसकी जिम्मेदारी भी हुक्मरानों की ही है।
यहाँ एक बात समझना और भी आवश्यक है कि अपराध का कोई धर्म या जाति नहीं होती। हर जाति और धर्म में अच्छे और बुरे लोग होते हैं। आज के दौर में राजनीतिक दल अपनी सुविधा के अनुसार जातियों को आमने-सामने खड़ा करने का जो खतरनाक खेल खेल रहे हैं, वह समाज को बांटने वाला है। रॉयल बुलेटिन का स्पष्ट मानना है कि जो भी दोषी हो, उसे सख्त से सख्त सजा मिले, लेकिन इस मामले की आड़ में जातियों के बीच विद्वेष की खाई नहीं बढ़नी चाहिए। किसी भी एक जाति या समुदाय को एकतरफा गलत ठहराना समाज के भविष्य के लिए घातक है।
आज वक्त की मांग है कि प्रशासन पूरी पारदर्शिता के साथ इन दोनों मामलों की तह तक जाए। न्याय केवल फाइलों में नहीं, बल्कि जमीन पर होता हुआ दिखना चाहिए। जब तक असली गुनाहगार सलाखों के पीछे नहीं होंगे और पीड़ितों के आंसू नहीं पोंछ दिए जाएंगे, तब तक इन गांवों में लगा यह 'पुलिसिया पहरा' केवल शांति का एक खोखला भ्रम मात्र होगा। रॉयल बुलेटिन की शासन-प्रशासन से अपील है कि कानून की लाठी निष्पक्ष चले और जनता से अपील है कि न्याय की इस लड़ाई में धैर्य और शांति बनाए रखें। याद रहे, हिंसा कभी इंसाफ का रास्ता नहीं हो सकती, लेकिन इंसाफ मिलने तक खामोश रहना भी गुनाह है।
