कमर्शियल एलपीजी संकट : होटल-ढाबों के कारोबारियों के सामने रोजी-रोटी का संकट

बरेली। शहर में कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों की किल्लत गहराने से होटल और फास्ट फूड कारोबार पर गंभीर असर पड़ा है। हालात ऐसे हैं कि कई इलाकों में रेस्टोरेंट और ढाबे बंद हो गए हैं, जबकि खुले प्रतिष्ठान भी सीमित संसाधनों में किसी तरह काम चला रहे हैं। गैस की कमी के चलते रसोई ठंडी पड़ने से कारोबारियों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
नोवेल्टी चौराहा, प्रेमनगर और मॉडल टाउन जैसे प्रमुख बाजारों में आम दिनों की चहल-पहल गायब है। यहां कई प्रसिद्ध चाट और फास्ट फूड दुकानें बंद पड़ी हैं। जिन दुकानों पर पहले ग्राहकों की भीड़ रहती थी, वहां अब सन्नाटा दिखाई दे रहा है। कारोबारियों का कहना है कि गैस न मिलने से नियमित संचालन संभव नहीं रह गया है।
सत्कार रेस्टोरेंट के संचालक नरेश कश्यप ने बताया कि सिलेंडर न मिलने के कारण उन्हें लकड़ी की भट्टी का सहारा लेना पड़ रहा है। इससे खाना बनाने में अधिक समय लग रहा है और ग्राहक भी इंतजार से बचने के लिए लौट रहे हैं। उनका कहना है कि यदि जल्द आपूर्ति बहाल नहीं हुई तो कारोबार बंद करना पड़ सकता है।
कई छोटे दुकानदार अंगीठी और कोयले पर काम करने को मजबूर हैं, लेकिन इससे न तो उत्पादन की गति बन पा रही है और न ही गुणवत्ता बरकरार रह पा रही है। धुएं और धीमी आंच के कारण काम करना मुश्किल हो रहा है, जिससे नुकसान बढ़ता जा रहा है। रोज कमाने-खाने वाले कारोबारियों पर इसका सबसे अधिक असर पड़ रहा है।
इधर, गैस एजेंसियों पर कालाबाजारी के आरोप भी लग रहे हैं। व्यापारियों का कहना है कि कृत्रिम कमी पैदा कर सिलेंडर ऊंचे दामों पर बेचे जा रहे हैं। उन्होंने प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग की है।
जिला पूर्ति अधिकारी मनीष कुमार सिंह ने बताया कि कमर्शियल सिलेंडरों की आपूर्ति प्रभावित है और स्थिति सामान्य करने के प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, कारोबारियों का कहना है कि अभी तक उन्हें राहत नहीं मिली है।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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