सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी के 350 सफाई कर्मियों का होगा पुलिस वेरिफिकेशन

इटावा- उत्तर प्रदेश के इटावा जिले की सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी में मूकबधिर महिला के साथ दुष्कर्म की घटना के बाद सफाई कर्मियों के पुलिस वेरिफिकेशन का मुद्दा सुर्खियों में आ गया है। पुलिस उपाधीक्षक रामगोपाल शर्मा ने बताया कि सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी प्रबंधन की ओर से पुलिस वेरिफिकेशन के सिलसिले में अगर पत्राचार किया जाएगा तो इटावा पुलिस सभी सफाई कर्मियों का पुलिस वेरीफिकेशन जरूर कराएगी। सफाई कर्मी कंपनी ने सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी में जिन सफाई कर्मियों को तैनात किया है उनका पुलिस वेरीफिकेशन नियुक्ति के समय नहीं कराया गया है इसलिए रेप की घटना के बाद सभी सफाई कर्मियों का पुलिस वेरिफिकेशन कराए जाने की जरूरत महसूस हो रही है।
मानसिक रोग विभाग में भर्ती अज्ञात महिला से सफाई कर्मचारी द्वारा दुष्कर्म की घटना के बाद सफाई कार्य देख रही सन फैसिलिटी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यूनिवर्सिटी परिसर में तैनात करीब 350 सफाई कर्मचारियों का पुलिस वेरिफिकेशन न होना और निगरानी तंत्र का कमजोर होना अब बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है। सितंबर 2022 से उक्त कंपनी के माध्यम से यूनिवर्सिटी में सफाई कार्य कराया जा रहा है। विभिन्न वार्डों, ओपीडी और संवेदनशील विभागों में बड़ी संख्या में कर्मचारी तैनात हैं, लेकिन कंपनी का कोई जिम्मेदार अधिकारी नियमित रूप से परिसर में मौजूद नहीं रहता। व्यवस्था मुख्य रूप से सुपरवाइजरों के भरोसे संचालित हो रही है, जबकि कंपनी प्रबंधन का आना-जाना प्रायः बिल भुगतान के समय तक सीमित बताया जाता है।
सबसे अहम तथ्य यह है कि इतने बड़े स्तर पर तैनात कर्मचारियों का समुचित पुलिस वेरिफिकेशन नहीं कराया गया। शासन की स्पष्ट गाइडलाइन के बावजूद इस अनिवार्य प्रक्रिया की अनदेखी सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। खासकर संवेदनशील वार्डों में बिना सत्यापन कर्मचारियों की तैनाती को बड़ी चूक माना जा रहा है।
यह पहला मामला नहीं है जब सफाई कर्मियों को लेकर सवाल उठे हों। वर्ष 2025 में यूनिवर्सिटी परिसर में मोबाइल चोरी की घटनाओं का खुलासा हुआ था, जिसमें इसी फर्म के अधीन कार्यरत एक सफाई कर्मचारी अपने साथी के साथ मिलकर वार्डों में सो रहे मरीजों और तीमारदारों के मोबाइल चोरी करते पकड़ा गया था। पुलिस ने दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर उनके पास से कई मोबाइल बरामद किए थे,जिन्हे जेल भेजा था। लेकिन इसके बावजूद निगरानी और सत्यापन व्यवस्था में अपेक्षित सुधार नहीं किया गया।
यूनिवर्सिटी में प्रतिदिन 8 से 10 जनपदों से बड़ी संख्या में मरीज और तीमारदार इलाज के लिए पहुंचते हैं। पीडियाट्रिक्स और गायनी विभाग जैसे वार्डों में सबसे अधिक भीड़ रहती है, जहां पूर्व में चोरी की घटनाएं भी अधिक सामने आई हैं। ऐसे में सफाई कर्मचारियों की तैनाती और उनकी निगरानी और भी संवेदनशील हो जाती है। ठेका प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है। कंपनी को प्रारंभ में एक वर्ष के लिए अनुबंध दिया गया था, लेकिन बाद में समय-समय पर इसका विस्तार किया जाता रहा और फर्म करीब चार वर्षों से लगातार कार्यरत बनी हुई है। इस बीच कई बार नए टेंडर निकाले गए, लेकिन उन्हें निरस्त कर दिया गया। वर्तमान में भी नया टेंडर जारी है, जिसमें 25 से अधिक फर्मों ने प्रतिभाग किया है।
कुलपति अजय सिंह ने कार्यभार संभालते ही ड्रेस कोड और आई कार्ड को प्राथमिकता देते हुए इसे अनिवार्य रूप से लागू करने के निर्देश दिए थे, ताकि परिसर में कार्यरत प्रत्येक कर्मचारी की स्पष्ट पहचान सुनिश्चित हो सके। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर इसका पालन अधूरा दिखाई देता है। जहां चिकित्सक और नर्सिंग स्टाफ नियमित रूप से आई कार्ड और ड्रेस कोड में नजर आते हैं, वहीं सफाई कर्मचारियों एवं वार्ड बॉय में इसका अनुपालन सीमित है।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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