“साहब, मैं जिंदा हूं!”—कागजों में मौत, जमीन पर कब्जा..मीरजापुर में हैरान करने वाला खेल उजागर

मीरजापुर। जनपद में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक जीवित व्यक्ति को सरकारी अभिलेखों में मृत घोषित कर उसकी पुश्तैनी जमीन किसी और के नाम दर्ज कर दी गई। मामला विकासखंड कोन क्षेत्र के मनौवा गांव निवासी सतानंद मौर्य का है, जो अब खुद को जिंदा साबित करने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
सतानंद मौर्य ने जिलाधिकारी पवन कुमार गंगवार को दिए प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया है कि क्षेत्रीय लेखपाल और अन्य राजस्व कर्मियों की मिलीभगत से खाता संख्या 83, खसरा संख्या 153 की करीब 0.3460 हेक्टेयर पुश्तैनी जमीन में उन्हें मृत दिखाकर वाराणसी जनपद के बड़ा लालपुर निवासी कल्पना श्रीवास्तव के नाम दर्ज कर दिया गया।
ये भी पढ़ें पुलिस भर्ती परीक्षा को लेकर नगर निगम की पहल, अभ्यर्थियों के लिए रैन बसेरों में ठहरने की व्यवस्थाहैरानी की बात तब सामने आई जब सतानंद ने खुद खतौनी निकलवाई, जिसमें वे “मृतक” दर्ज थे और उनकी जमीन पर किसी अन्य का नाम चढ़ा हुआ था। यह देख उनके पैरों तले से जमीन खिसक गई। पीड़ित का कहना है कि उन्होंने लेखपाल और कानूनगो से मिलकर अपने जीवित होने की जानकारी दी, लेकिन कई दिनों तक तहसील और कचहरी के चक्कर लगाने के बावजूद उनकी सुनवाई नहीं हुई। आरोप है कि अधिकारियों ने मामले को गंभीरता से लेने के बजाय टालमटोल किया। आखिरकार थक-हारकर सतानंद मौर्य ने जिलाधिकारी से गुहार लगाई है कि उन्हें कागजों में “जिंदा” किया जाए और उनकी पुश्तैनी जमीन वापस दिलाई जाए।
यह मामला न केवल राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे कागजी हेरफेर से किसी की पहचान और हक दोनों छीन लिए जाते हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन इस “जिंदा आदमी की मौत” के मामले में क्या कार्रवाई करता है।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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