"फ्री खाना मिला तो लोग काम क्यों करेंगे?"— सुप्रीम कोर्ट ने मुफ्त सुविधाओं की राजनीति पर उठाए गंभीर सवाल
रोजगार दें, रेवड़ी नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को दी आत्मनिर्भरता की नसीहत
नई दिल्ली। देश में चुनाव से पहले राजनीतिक दलों द्वारा दी जाने वाली मुफ्त सुविधाओं (Freebies) के मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी की है। कोर्ट ने सरकारों को आईना दिखाते हुए कहा कि जनता को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय उन्हें 'फ्री' की आदत डालना भविष्य के लिए खतरनाक है।
"काम करने का जज्बा हो रहा खत्म"
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि यदि लोगों को सब कुछ मुफ्त में मिलने लगेगा, तो उनके भीतर काम करने की इच्छा ही खत्म हो जाएगी। कोर्ट ने टिप्पणी की:
"अगर आप लोगों को मुफ्त खाना, मुफ्त बिजली और मुफ्त पानी देंगे, तो वे मेहनत क्यों करेंगे? इससे समाज में उत्पादकता (Productivity) घटेगी और लोग पूरी तरह सरकार पर निर्भर हो जाएंगे। यह देश की प्रगति के लिए सही मॉडल नहीं है।"
मुफ्त सुविधाओं के बजाय 'रोजगार' पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को सुझाव दिया कि सरकारी खजाने का इस्तेमाल मुफ्त रेवड़ियां बांटने के बजाय स्थायी रोजगार (Employment) पैदा करने में किया जाना चाहिए। कोर्ट का तर्क है कि जब व्यक्ति कमाएगा, तो वह खुद अपनी सुविधाएं खरीदने में सक्षम होगा, जिससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
अर्थव्यवस्था पर बोझ की चिंता
कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि मुफ्त सुविधाओं के कारण राज्यों पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। कई राज्य वित्तीय संकट की कगार पर हैं, फिर भी वोटों की खातिर बिजली, पानी और अन्य सेवाओं को मुफ्त करने की होड़ मची है।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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