‘वंदे मातरम्’ पर बयान से बवाल! तीखी टिप्पणी के बाद देशभर में छिड़ी नई बहस
नई दिल्ली/लखनऊ। भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर एक बार फिर देश में वैचारिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण देखने को मिल रहा है। विवाद की जड़ केंद्र सरकार का वह निर्देश है, जिसमें 'वंदे मातरम्' के उन हिस्सों को भी शामिल करने की बात कही गई है जिन्हें ऐतिहासिक रूप से (1937 के बाद से) अनिवार्य गायन से बाहर रखा गया था।
विवाद का मुख्य कारण
आमतौर पर 'वंदे मातरम्' के पहले दो छंद ही गाए जाते हैं। लेकिन हालिया निर्देशों के अनुसार, आधिकारिक समारोहों में इसके पूरे 6 श्लोक के गायन को प्रोत्साहित किया जा रहा है। विपक्षी दलों और कुछ धार्मिक संगठनों का तर्क है कि बाद के छंदों में 'मातृभूमि' को देवी के रूप में चित्रित किया गया है, जो इस्लाम की एकेश्वरवादी (Monotheism) मान्यताओं के विपरीत है।
ये भी पढ़ें दिल्ली दंगा साजिश केस: खालिद सैफी की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से मांगा जवाबदेश में एक बार फिर “वंदे मातरम्” को लेकर विवाद ने तूल पकड़ लिया है। एक तरफ इसे राष्ट्रसम्मान का प्रतीक बताया जा रहा है, तो दूसरी तरफ इसे लेकर धार्मिक आपत्तियां भी सामने आ रही हैं। इसी मुद्दे पर आई एक तीखी प्रतिक्रिया ने अब पूरे मामले को और ज्यादा संवेदनशील बना दिया है।जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी द्वारा “वंदे मातरम्” गाने को लेकर जताई गई आपत्ति के बाद जगतगुरु परमहंस आचार्य ने कड़ा बयान देते हुए मदनी के रुख का विरोध किया और इसे राष्ट्रसम्मान से जोड़कर देखा। उनकी टिप्पणी के बाद यह मुद्दा तेजी से सुर्खियों में आ गया।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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