इंदौर राजवाड़ा में 300 साल पुरानी शाही होली की परंपरा, आज भी जिंदा, जानें सरकारी होलिका दहन का गौरवशाली इतिहास
होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं है बल्कि यह हमारी परंपराओं और इतिहास की जीवंत पहचान भी है। इंदौर का राजवाड़ा पिछले लगभग तीन सौ वर्षों से होलिका दहन की ऐतिहासिक परंपरा का साक्षी बना हुआ है। हर वर्ष की तरह इस बार भी 2 मार्च की संध्या को यहां होलकर राजवंश की रीति नीति के अनुसार होलिका दहन किया जाएगा। भले ही राजशाही व्यवस्था अब इतिहास बन चुकी हो लेकिन यह परंपरा आज भी प्रशासनिक संरक्षण में निरंतर जारी है। यही वजह है कि इसे सरकारी होली के नाम से भी जाना जाता है।
मल्हारराव होलकर के समय से शुरू हुई गौरवशाली परंपरा
मल्हारराव होलकर के शासनकाल में राजवाड़ा के मुख्य द्वार के सामने गोधूलि बेला में होलिका दहन की शुरुआत मानी जाती है। उस समय यह आयोजन राजसी गरिमा और अनुशासन के साथ संपन्न होता था। देश के कई राजमहलों में होली मनाई जाती थी लेकिन इंदौर का राजवाड़ा अपनी निरंतरता और परंपरा के कारण अलग पहचान रखता है। प्रथम पूजन आज भी होलकर परिवार के सदस्य द्वारा किया जाता है और उसके बाद आम श्रद्धालु पूजा में भाग लेते हैं।
लगभग तीन सौ वर्षों का ऐतिहासिक सिलसिला
इतिहासकारों के अनुसार राजवाड़ा के सामने होलिका दहन की परंपरा करीब 290 से 300 वर्ष पुरानी है। कुछ विद्वान इसे 298 वर्ष प्राचीन मानते हैं। जब गौतमा बाई साहिब इंदौर आईं और राजवाड़ा के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई तभी से इस परंपरा की नींव पड़ी मानी जाती है। इस तरह यह उत्सव केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं बल्कि इंदौर के स्थापत्य और सामाजिक इतिहास से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
पंद्रह दिन तक चलता था शाही होली महोत्सव
राजशाही काल में होली का उत्सव केवल एक दिन का नहीं बल्कि पूरे पंद्रह दिनों तक चलने वाला भव्य समारोह होता था। राजवाड़े के भीतर रंगीन मंडप सजाए जाते थे। संगीत नृत्य और पारंपरिक खेलों का आयोजन होता था। होलकर नरेश और दरबारी बैंड बाजों के साथ जुलूस निकालते थे और पवित्र अग्नि लाकर होलिका दहन संपन्न करते थे। दूसरे दिन वीर निकालने की परंपरा भी थी जो स्वतंत्रता के बाद समाप्त हो गई।
ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज है भव्यता
पुराने प्रशासनिक दस्तावेजों में उल्लेख मिलता है कि होलिकोत्सव पर होने वाला पूरा खर्च राजकोष से वहन किया जाता था। उस समय दो दिन का राजकीय अवकाश घोषित रहता था। गजेटियर में भी इस पर्व की भव्यता और सामाजिक सद्भाव का उल्लेख मिलता है। यह उत्सव सभी धर्मों के लोगों द्वारा मिलकर मनाया जाता था और भाईचारे का प्रतीक माना जाता था।
गौ काष्ठ से प्रज्वलित होती है परंपरागत होलिका
हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी गोधूलि बेला में गौ काष्ठ से निर्मित होलिका का दहन किया जाएगा। राजपरिवार के राजपुरोहित परंपरागत विधि विधान से यह अनुष्ठान संपन्न कराते हैं। होलकर राजपरिवार के प्रतिनिधि इसमें सम्मिलित होते हैं जिससे सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी जीवित बनी हुई है।
इंदौर की आन बान शान राजवाड़ा
राजवाड़ा इंदौर केवल एक ऐतिहासिक इमारत नहीं बल्कि इंदौर की पहचान है। 1728 में जब मल्हारराव होलकर को पेशवा से इंदौर और आसपास के क्षेत्र जागीर में मिले तब यहां स्थायी निवास और भव्य राजप्रासाद के निर्माण का निर्णय लिया गया। 1734 से 1744 के बीच इसका निर्माण आरंभ हुआ और समय के साथ इसमें विस्तार होता गया। कई उतार चढ़ाव देखने के बाद भी राजवाड़ा आज भी इंदौर की शान के रूप में खड़ा है और हर वर्ष होलिका दहन की परंपरा के माध्यम से अपने गौरवशाली इतिहास को जीवंत करता है।
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