अहंकार: विवेक का शत्रु और सम्मान का ह्रास करने वाला रोग
अहंकार मनुष्य के जीवन का एक गंभीर रोग है। यह किसी भी कारण से उत्पन्न हो सकता है, लेकिन जब यह मन में घर कर लेता है तो व्यक्ति को मदांध बना देता है। विवेक का लोप होने लगता है और अविवेक की छाया उसके निर्णयों पर हावी हो जाती है। परिणामस्वरूप वह सही और गलत का अंतर समझने में असमर्थ हो जाता है।
अहंकारी व्यक्ति चाहे कितने ही धार्मिक कार्य क्यों न कर ले, उसके आचरण में झलकता दंभ समाज को स्वीकार्य नहीं होता। ऐसे व्यक्ति के प्रति सम्मान कम होने लगता है और उपेक्षा का भाव उत्पन्न हो जाता है। उसके द्वारा किया गया धर्माचरण भी पाखंड प्रतीत होने लगता है, क्योंकि दिखावे और घमंड से युक्त व्यवहार अंततः निंदा ही दिलाता है।
इसके विपरीत जो व्यक्ति निरभिमानी, सरल और विनयशील होता है, वही सच्चे धर्म के मार्ग पर अग्रसर होता है। विनम्रता और सद्व्यवहार ऐसे गुण हैं जो व्यक्ति को समाज में प्रतिष्ठा और सम्मान दिलाते हैं। सफल जीवन का स्वामी वही बनता है, जो इन गुणों को अपने आचरण में उतारता है।
हमें अपने व्यवहार में श्रेष्ठता लाने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए। वे उपाय, जो हमारे आचरण को शुद्ध और उदार बनाते हैं, वही हमें सम्मानीय बनाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करें, जैसा व्यवहार हम स्वयं अपने लिए अपेक्षित करते हैं। यही सच्चा धर्म है और यही हमारा सामाजिक कर्तव्य भी है।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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