होली व्यंग्य: होली खेल रहे दढियल,’इंडी’ गलियन में… बोलो भैया शान से, नंग बड़े भगवान से
होली है भैया जी, होली है तनिक घर से बाहर भी निकल कर देखो ना ! कितनी मस्ती काट रहे हैं भांति भांति के होरियारे और ‘आप’ हैं कि दरवज्जे बंद किए बैठे हैं। मोहल्लाछाप अंतरराष्ट्रीय कवि झल्लम झल्ला भौकाल मचाते हुए अंदर घुसे ।
ये भी पढ़ें होली 2026 : कोल्ड ड्रिंक्स नहीं रंगों के त्योहार पर ट्राई करें ठंडई, घर पर ऐसे करें तैयार वैसे उनकी ख़ास बात यह भी है कि उनकी कविता में कमाल हो न हो मगर उनकी नाक बड़ी कमाल की है। कई गज दूर से ‘शाही’ पकौड़ो की महक पता नहीं उन तक कैसे पहुंच जाती है और वें ठीक उसी तरह अंदर घुस जाते हैं जैसे सत्ता में आने की भनक भर लगते ही अवसरवादी नेता ‘दल-दल- ( ग़लत मत समझिए मेरा मतलब है इस दल से उस दल में) घुस जाते हैं।
अब आज तो होली ठहरी सो भंग के पकौड़े बन रहे थे और साथ में घुट रहा था भोले बाबा का प्रसाद ऐसे में झल्ला जी की आमद से हमारा झल्लाना स्वाभाविक था मगर उन्हें तो ‘अतिथि कब जाओगे’ भी नहीं कह सकते थे। अब मन ही मन में हम ओ टी टी के किसी ताजा तरीन सीरियल वाली भाषा बोल रहे थे पर ज़बान से निकल रहा था “होली मुबारक हो झल्ला जी होली मुबारक हो। “
इससे पहले कि हम उन्हें टालने का कोई बहाना बनाते झल्ला जी कंधे पर पड़ा झोला खोलने लगे, (ज़बान तो पहले ही खोल चुके थे) ‘भाभी क्या गज़ब के पकौड़े बनाती हो महक ‘इंडिया’ वालों तक जा रही है अब भले ही हम ‘इंडिया’ वाले हैं पर पकौड़े तो ‘सब का साथ, सबका विकास’ की ही डिमांड करते हैं ! तो आज तो मैं खाकर ही जाऊंगा । ”हमने मन ही मन कहा “भला कभी ऐसा भी हुआ है क्या कि आप बिना खाए गए हों ?”
वह कहते हैं न कि बड़ी चोट, छोटी चोट को भुला देती है तो इसीलिए हम पकौड़ों के बलिदान से पड़ने वाली चोट को भूल उनकी कविताओं की घातक चोट से बचने का जुगाड़ ढूंढ रहे थे। मगर हम कोई पी एम तो है नहीं कि हमारे ‘मन की बात’ को कोई सुनता । सो झल्लम झल्ला जी शुरू हो गए।
होली खेल रहे दढियल,
भारत गलियन में,
घूम रही बस कुर्सी मैया,
सबकी अंखियन में,
होली खेल रहे दढियल…
इससे पहले कि झल्लम जी रंग से भंग में आते, हमने यॉर्कर डाल दिया “अरे छोड़िए भी झल्लम जी काहे होली में भी राजनीति घुसेड़ रहे हो ?
अब झल्लम झल्ला जी तो ताक में थे ही हमारे छक्के की उम्मीद वाले शॉट को गली में लपक कर बोले “प्रभु, राजनीति कहां नहीं है ? राजनीति धर्म में है, कर्म में है, ठंडे में है, गर्म में है, राजनीति में रेवड़ियां हैं और रेवड़ियों में राजनीति है, सरकार में राजनीति है, अपोजिशन में राजनीति है आजकल तो हर पोजीशन में राजनीति है फिर भला होली कैसे बच सकती है……”
कण-कण व्यापी पॉलिटिक्स है,
पॉलिटिक्स में दम है,
पॉलिटिक्स में माल मलाई ,
फिर काहे का ग़म है…
बस, बस, बस, झल्ला जी अब बस भी करो! इधर पकौड़े ठंडे हो रहे हैं और आप कविता पेले जा रहे हैं। अचानक ही जैसे उनकी कविता पर ब्रेक लग गया, ठीक वैसे ही जैसे चुनाव के तुरंत बाद उन सारी योजनाओं पर लग जाता है जो पिछली सरकार सुपरफास्ट स्पीड में चला रही थी।
ख़ैर पकोड़ों के बहाने से उनकी कविता से हमारा बचाव हो गया दस बीस को अंदर कर बिना डकार लिए बोले “वाह भाई वाह, पकौड़े भी क्या चीज हैं देश बदल कर रख दिया पकौडों ने।
अब देखो ‘मोटा भाई’ ने पकौड़ा तलने का रोजगार फंडा दिया था और सत्ता महारानी उन पर फ़िदा हो गई थीं अब मौज कर रहे हैं। पर, पकौड़ों की जोड़ी बनती दारू के साथ ही है तो “तो जोड़ी बनवा दीजिए ना बाबू अंदर अकेले पकौड़े मचल रहे हैं” । लेकिन उनके इस वार को हमने मुस्कुराकर दूसरी तरफ मोड़ दिया
झल्लम झल्ला आराम से समझ गए और फिर सांस लेकर बोले “यह राजनीति भी बड़े काम का धंधा है साहेब!” इससे पहले कि हम कुछ कहते खुद ही कहने लगे “प्रभु, होली में तो धंधा और पानी दोनों ही जरूरी हैं । होली तो अब है ही धंधेबाजो की । चलो आपको बताता हूं होली के धंधेबाजों की माया।
“वह कैसे ?” हमने पूछा ।
झल्लम झल्ला जी लंबी सांस लेकर बोले-” देख लो, अमरीका वाले वारस्टॉप नोबेल लालायित ललमुंहे दोलांड साहब दोस्त से दोस्ती नहीं निभा रहे, कभी मार्केट तो कभी पुचकारकर टैरिफ ट्रंपकार्ड चला रहे हैं, यह चौक्खी बात नहीं ना!” आज पहली बार हम झल्ला जी की जनरल नॉलेज पर खुलकर मुस्कुराए । हमारी मुस्कुराहट को देखकर उनका हौसला, बढ़ा और फिर आधा कवि, आधा दार्शनिक और फुलफंटूस जोकर रायता बाबू के हालात पर आंसू बहाते हुए बोले ” अब देखो हर होली पर उन्हें बार-बार दाग-दार कहकर सत्तारानी के घर से निकलवा दिया लेकिन अब कोर्ट बाबू ने कह दिया कि उनकी शर्त तो झकाझक बेदाग सफेद रही है। अब कितना ही रगड़ रगड़ कर साबुन से चमक को लेकिन कुर्सी रानी ने तो धकिया ही दिया ना ! फिर ऊंचे सुर में गाने लगे-
हमने तुम्हें चुना था,
मेहरबान समझ कर,
और तुम हमें चबा रहे,
पान समझ कर ।
क्या झल्लन भाई फिर राजनीति ‘ आज भी?
“अजी, राजनीति कब नहीं होती ? राजनीति तो हमारे ख़ून में है । अब देख लो ख़ून ख़राबे वाले राजनीति में आ रहे हैं और राजनीति वाले ख़ून खराबा करवाने का कोई मौका नहीं छोड़ते । यानि ये लोग तो राउंड द ईयर 24 x 7 होली खेलते हैं ।
अब अपने मोटा भाई का मौका लगा तो लाल पीले हो रहे अपने हुलहुल भैया को ही धो डाला । हुलहुल बदलने वाले हैं न डरने वाले । जितना मर्जी मुंह काला कर लो पर हर बार सफेद टी-शर्ट में आ धमकते हैं वह कहते हैं ना की नंग बड़े भगवान से। इसलिए उधर सब बनावटी बुद्धि का बिजनेस वर्ल्डवाइड करने जा रहे द रियल भवन में अपने नंग भेज कर वहां रंग में भंग करा दिया। अब यह अलग बात है कि उनके चेले चपाटे रोज पुलिस के हत्थे चढ़ रहे हैं। इशारों ही इशारों में कुर्सी धारी कह रहे हैं
पक्का रंग चढ़ा दो प्यारों,
इनके बम सुजा दो यारों
आगा पीछा लाल करो तुम
होली पर कमाल करो तुम
-डॉ घनश्याम बादल
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