इलेक्ट्रो होम्योपैथी को देश में मान्यता नहीं: केंद्र सरकार ने किया रुख स्पष्ट, 'डॉक्टर' लिखने पर भी पाबंदी
स्वास्थ्य मंत्रालय ने लखनऊ के इलेक्ट्रो होम्योपैथी मेडिकल एसोसिएशन को भेजा पत्र; डिग्री या कोर्स को वैधानिक दर्जा नहीं, पंजीकरण पर भी रोक

लखनऊ। चिकित्सा के क्षेत्र में इलेक्ट्रो होम्योपैथी (इलेक्ट्रोपैथी) की पढ़ाई और प्रैक्टिस को लेकर केंद्र सरकार ने एक बार फिर अपना रुख बेहद स्पष्ट कर दिया है। सरकार ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि इलेक्ट्रो होम्योपैथी भारत में मान्यता प्राप्त चिकित्सा पद्धति नहीं है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग द्वारा जारी एक पत्र में इस जानकारी की पुष्टि की गई है।
अवर सचिव संजीव सिंह ने जारी किया स्पष्टीकरण
भारत सरकार के अवर सचिव संजीव सिंह की ओर से इलेक्ट्रो होम्योपैथी मेडिकल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के संयुक्त सचिव मृदुलेश कुमार मिश्रा (लखनऊ) को भेजे गए पत्र में कड़े निर्देश दिए गए हैं। पत्र में स्पष्ट किया गया है कि इलेक्ट्रो होम्योपैथी या इलेक्ट्रोपैथी से संबंधित किसी भी प्रकार की डिग्री, डिप्लोमा या कोर्स को सरकार ने अब तक कोई मान्यता नहीं दी है।
नाम के आगे 'डॉक्टर' लगाने पर भी संकट
केंद्र सरकार के इस स्पष्टीकरण के बाद अब इस पद्धति के आधार पर कोई भी व्यक्ति चिकित्सा अभ्यास (प्रैक्टिस) के लिए पंजीकरण नहीं करा सकता है। यही नहीं, पत्र में यह भी साफ किया गया है कि इस पद्धति से जुड़े लोग अपने नाम के आगे "डॉक्टर" की उपाधि का उपयोग करने के हकदार नहीं हैं। सरकार ने यह भी साफ किया है कि इस पद्धति को मान्यता देने या इसके लिए किसी वैधानिक बोर्ड या काउंसिल के गठन को लेकर अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।
क्या है इलेक्ट्रो-होम्योपैथी?
गौरतलब है कि इलेक्ट्रो-होम्योपैथी 19वीं सदी में काउंट सीज़र मैटेई द्वारा विकसित एक वैकल्पिक हर्बल चिकित्सा पद्धति है। यह पौधों के अर्क पर आधारित है और दावा करती है कि यह शरीर के लिम्फ और रक्त को संतुलित कर बीमारियों का इलाज करती है। लंबे समय से इसे मान्यता देने की मांग उठती रही है, लेकिन फिलहाल केंद्र सरकार के इस कड़े रुख ने इसे आधिकारिक चिकित्सा प्रणाली से पूरी तरह बाहर रखा है।
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