शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के कथित उत्पीड़न और दर्ज मुकदमों की निष्पक्ष जांच की मांग, गरमाया मुद्दा
मेरठ। कुम्भ के पावन अवसर पर सनातन परंपरा के सर्वोच्च आध्यात्मिक पदों में से एक पर आसीन ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी और उनके शिष्यों के साथ हुए कथित दुर्व्यवहार का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। इस संबंध में शासन और प्रशासन से पूरे प्रकरण की पारदर्शी और उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग उठाई गई है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, मौनी अमावस्या के पवित्र स्नान के दौरान पुलिस प्रशासन पर शंकराचार्य और उनके साथ आए बटुकों को स्नान से रोकने तथा उनके साथ अपमानजनक व्यवहार करने के गंभीर आरोप लगे हैं। चर्चा है कि उन्हें थाने ले जाकर प्रताड़ित भी किया गया, जिसे लेकर धार्मिक जगत में गहरा रोष है। जानकारों का कहना है कि यदि ये आरोप सत्य हैं, तो यह न केवल करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर चोट है, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का भी सीधा उल्लंघन है।
यौन शोषण के आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग
इसी बीच, शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, उनके शिष्य स्वामी मुकुंदानंद ब्रह्मचारी और अन्य के विरुद्ध यौन शोषण के आरोपों में प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कराई गई है। इन गंभीर आरोपों को लेकर यह मांग की जा रही है कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए। पत्र के माध्यम से यह भी आग्रह किया गया है कि शिकायतकर्ता व्यक्तियों की पृष्ठभूमि और उनके संभावित प्रेरक तत्वों (मोटिव) की भी गहनता से पड़ताल की जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कहीं यह किसी गहरी साजिश का हिस्सा तो नहीं है।
संविधान और गरिमा की रक्षा की अपील
प्रशासन से मांग की गई है कि इस पूरे संवेदनशील मामले की समयबद्ध और उच्चस्तरीय जांच सुनिश्चित की जाए। जांच प्रक्रिया को इतना पारदर्शी बनाने की अपील की गई है जिससे किसी निर्दोष व्यक्ति की सामाजिक गरिमा को ठेस न पहुंचे। धार्मिक संस्थाओं और अनुयायियों की अपेक्षा है कि शासन इस विषय पर संवेदनशीलता दिखाते हुए आवश्यक निर्देश प्रदान करे ताकि सत्य सबके सामने आ सके और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हो सके।
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