मुजफ्फरनगर पुलिस को हाईकोर्ट से झटका, आरोपी को मिली जमानत, छापेमारी की वीडियोग्राफी न हुई तो नपेंगे अफसर
प्रयागराज/मुजफ्फरनगर। (रॉयल बुलेटिन ब्यूरो)। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि अब किसी भी तलाशी या जब्ती की वीडियोग्राफी अनिवार्य होगी। कोर्ट ने डीजीपी को निर्देश दिया कि वह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 105 के तहत निर्धारित ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के लिए तत्काल एक विस्तृत स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) जारी करें।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को निर्देश दिया कि वह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 105 के तहत निर्धारित तलाशी और जब्ती की अनिवार्य ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के लिए एक विस्तृत स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) जारी करें। 40 मोटरसाइकिलों की कथित बरामदगी से जुड़े चोरी के मामले में आरोपित को जमानत देते हुए जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच ने कहा कि बीएनएसएस की धारा 105 के अनिवार्य प्रावधान का पालन न करने से पूरी अभियोजन कहानी पर संदेह पैदा होता है।
कोर्ट ने आगे कहा कि यह कानून निर्दोष व्यक्तियों को गलत फंसाए जाने से बचाने और ट्रायल के लिए पुख्ता सबूत सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया। इसने एक कदम और आगे बढ़ते हुए कहा कि पुलिस अधिकारियों द्वारा इस प्रावधान का पालन न करने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है।
मामले के अनुसार याची शादाब पर बीएनएस की धारा 305(2) और 317(2) के तहत मामला दर्ज किया गया, जिसमें आरोप है कि वह चार अन्य सह-आरोपियों के साथ 40 मोटरसाइकिलों की चोरी में शामिल है और इतनी ही संख्या में बाइक उनके संयुक्त कब्जे से बरामद हुईं। मुकदमा थाना मंसूरपुर, जिला मुजफ्फरनगर में दर्ज किया गया।
इस मामले में जमानत मांगते हुए उसके वकील ने तर्क दिया कि आवेदक का नाम एफआईआर में नहीं है और कथित तौर पर इतनी बड़ी बरामदगी के बावजूद, कोई निजी गवाह या कार्यवाही की वीडियोग्राफी नहीं की गई। यह तर्क दिया गया कि बीएनएस धारा 105 के अनुसार बरामदगी की वीडियोग्राफी अनिवार्य है। इसकी अनुपस्थिति से अभियोजन पक्ष की कहानी पर संदेह पैदा होता है। यह भी बताया गया कि सह-आरोपियों को हाईकोर्ट की अन्य बेंचों द्वारा पहले ही जमानत दी जा चुकी है।
कोर्ट ने पाया कि इस मामले में यूपी पुलिस मोटरसाइकिलों की बरामदगी या ज़ब्ती सूची तैयार करने की कोई वीडियोग्राफी करने में विफल रही थी। कोर्ट ने कहा कि बीएनएसएस की धारा 105, जिसे यूपी भारतीय नागरिक सुरक्षा नियम, 2024 के नियम 18 के साथ पढ़ा जाए, उसके तहत ई-साक्ष्य ऐप या अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से प्रक्रिया को रिकॉर्ड करना अनिवार्य है। कोर्ट ने कहा “यह तथ्य न केवल पुलिस की लापरवाही बल्कि मनमानी को भी दिखाता है, जिससे जब्त की गई चीज़ों की बरामदगी के बारे में प्रॉसिक्यूशन की कहानी पर शक पैदा होता है...“।
कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि बीएनएसएस की धारा 105 को खास तौर पर कुछ पुलिस अधिकारियों द्वारा झूठी बरामदगी को रोकने और निष्पक्ष सुनवाई के लिए विश्वसनीय कानूनी सबूत तैयार करने के लिए बनाया गया। धारा 105 और यूपी बीएनएस नियमों के नियम 18 को पढ़ते हुए बेंच ने कहा कि तलाशी या ज़ब्ती की प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग को केस डायरी का हिस्सा बनाया जाना चाहिए और उसे 48 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट को भेजा जाना चाहिए।
कोर्ट ने आगे कहा कि हालांकि डीजीपी ने 21 जुलाई, 2025 को ऐसी रिकॉर्डिंग की अनिवार्यता के संबंध में एक सर्कुलर जारी किया, लेकिन नियम 18(5) के अनुसार नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के साथ समन्वय में एक विस्तृत एसओपी अभी जारी किया जाना बाकी है। कोर्ट ने कहा कि उसके सामने कई ऐसे मामले आए हैं, जहां बरामदगी के संबंध में कोई स्वतंत्र गवाह नहीं मिला और तब भी ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की गई। हाईकोर्ट ने अनिवार्य वीडियोग्राफी प्रावधानों का पालन न करने, जेलों में भीड-़भाड़ और सह-आरोपितों के साथ समानता के आधार पर जमानत याचिका मंजूर कर ली।
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