लाशों पर जश्न और संवेदनाओं का कत्ल; क्या इतनी संवेदनहीन हो गई है मुज़फ्फरनगर की सियासत ?
लोकतन्त्र में लोक-लाज और संवेदना दो ऐसे स्तंभ हैं, जिनसे जनता और नेतृत्व के बीच का विश्वास अडिग रहता है। लेकिन गुरुवार को मुज़फ्फरनगर में जो तस्वीर उभरी, उसने इस विश्वास और संवेदनशीलता पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर ज़िले का एक कोना 'सोनू कश्यप' की नृशंस हत्या के गम में डूबा है, कश्यप समाज की आँखों में आँसू और सीने में इंसाफ की आग धधक रही है, तो दूसरी ओर उसी समाज का नेतृत्व करने वाले उत्तर प्रदेश सरकार के राज्यमंत्री नरेंद्र कश्यप के आवास पर जन्मदिन के जश्न की शहनाइयाँ गूँज रही थीं।
सोनू कश्यप की हत्या महज एक अपराध नहीं, बल्कि एक परिवार के चिराग का बुझना है। घर का आँगन अभी तक सांत्वना देने वालों की भीड़ से भरा है, लेकिन मंत्री आवास पर केक काटने और फूल-मालाओं का जो मंजर दिखा, वह किसी भी संवेदनशील हृदय को कचोटने के लिए पर्याप्त है। क्या राजनीति इतनी शुष्क हो चुकी है कि वह अपने ही समाज के एक नौजवान की अर्थी की गंध और उत्सव के फूलों की खुशबू में फर्क करना भूल गई है ?
यह कैसी विडंबना है कि जिस कश्यप समाज के वोटों की सीढ़ी चढ़कर नेता सत्ता के गलियारों तक पहुँचते हैं, उसी समाज के एक बेटे की निर्मम हत्या पर दो आंसू बहाने के बजाय मंत्री जी और उनके समर्थकों को 'हैप्पी बर्थडे' की धुन अधिक सुहावनी लगी। क्या मंत्री जी इतने विवश थे कि अपने जन्मदिन के इस 'तमाशे' को कुछ दिनों के लिए टाल नहीं सकते थे ? क्या सत्ता की हनक इतनी हावी हो चुकी है कि उन्हें अपने ही समाज की सिसकियाँ सुनाई देना बंद हो गई हैं ?
मंत्री आवास पर दिग्गजों की जो कतार लगी थी, उसमें ज़िले के सांसद, विधायक और कई रसूखदार चेहरे शामिल थे। अफसोस इस बात का है कि इनमें से किसी ने भी मंत्री जी को यह याद दिलाने की जहमत नहीं उठाई कि साहिब! ज़िले में और उनके समाज में भी मातम है, आज यह जश्न शोभा नहीं देता। जन्मदिन पर कंबल और ट्राइसाइकिल बांटने का स्वांग रचकर इसे 'सेवा' का नाम देना दरअसल संवेदनहीनता को छिपाने का एक घटिया प्रयास मात्र है। ऐसी 'सेवा' किस काम की, जो पीड़ित परिवार के सीने में चुभ जाए ?, मंत्री जी ने इस अवसर पर दिव्यांगों को ट्राइसाइकिल और गरीबों को कंबल बाँटकर इसे 'सेवा' का नाम देने की कोशिश की, जो सराहनीय है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह 'सेवा' चार दिन बाद नहीं हो सकती थी ?
आयोजन में मंत्री अनिल कुमार, जसवंत सैनी, सांसद, विधायक और संगठन के कई बड़े चेहरे वहाँ पहुँचे। इन सभी की मौजूदगी ने उस जश्न को और भव्य बनाया, जबकि इसी नेतृत्व से उम्मीद थी कि वे पीड़ित परिवार के घावों पर मरहम लगाएंगे। कश्यप समाज और ज़िले की जनता आज इस विरोधाभास को देख रही है।
जनता केवल भाषणों और दान-पुण्य के प्रतीकात्मक कार्यों से संतुष्ट नहीं होती। नेतृत्व का असली इम्तिहान संकट के समय सहानुभूति और सादगी दिखाने में होता है। जब समाज का एक घर मातम मना रहा हो, तब सत्ता के गलियारों में उत्सव की गूँज एक कड़वा संदेश छोड़ती है। मुज़फ्फरनगर की जनता अब केवल आश्वासनों को नहीं, बल्कि उस संवेदनशीलता को तलाश रही है, जो उसे अहसास करा सके कि उसका 'प्रतिनिधि' वास्तव में उसके सुख-दुख का सहभागी है।
मुज़फ्फरनगर की जनता आज देख रही है कि उसके जनप्रतिनिधि दुख में साथ खड़े होने के बजाय उत्सव प्रेमी अधिक हो रहे हैं। यह घटना केवल एक मंत्री के जन्मदिन की नहीं है, बल्कि यह उस मर चुकी राजनैतिक नैतिकता का प्रमाण है, जहाँ पद और प्रतिष्ठा के आगे रिश्तों और समाज की पीड़ा का कोई मोल नहीं रह गया है। सत्ताधीश याद रखें, जश्न की ये फूल-मालाएं जनता की नाराजगी की आग में राख होते देर नहीं लगती। सोनू कश्यप को इंसाफ मिले या न मिले, लेकिन मुज़फ्फरनगर की तारीख में यह 'मातम पर मनाया गया जन्मदिन' एक काले अध्याय के रूप में दर्ज ज़रूर हो गया है।
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