उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए यूजीसी एक्ट 2026 लागू करने की मांग, राष्ट्रपति को सौंपा ज्ञापन
मुजफ्फरनगर। जिले में उच्च शिक्षा संस्थानों के भीतर बढ़ते भेदभाव और छात्रों की आत्महत्या की दुखद घटनाओं को लेकर 'अपनी जनता पार्टी' ने मोर्चा खोल दिया है। उत्तर प्रदेश इकाई के जिलाध्यक्ष सलीम सैलानी के नेतृत्व में महामहिम राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन सौंपा गया, जिसमें विश्वविद्यालयों में पारदर्शिता, समानता और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए 'यूजीसी एक्ट 2026' को तत्काल और प्रभावी रूप से लागू करने की पुरजोर मांग की गई है।
ज्ञापन के माध्यम से अवगत कराया गया कि प्रस्तावित यूजीसी विधेयक 2026 भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 17, 18 और 21 के अनुरूप है, जो नागरिकों को समानता, गरिमा और शिक्षा का मौलिक अधिकार प्रदान करते हैं। संगठन का तर्क है कि इस कानून का मुख्य उद्देश्य धर्म, जाति, नस्ल, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर होने वाले हर प्रकार के भेदभाव को जड़ से समाप्त करना है। इससे विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों को एक सुरक्षित और सम्मानजनक शैक्षणिक वातावरण मिल सकेगा।
ये भी पढ़ें बिजनौर: कमिश्नर आनंजय कुमार ने ग्राम चौपाल में परखी विकास कार्यों की हकीकत, खाली रजिस्टर देख बिफरे सलीम सैलानी ने रोहित वेमुला, डॉ. पायल तडवी और दर्शन सोलंकी जैसे चर्चित मामलों का हवाला देते हुए बताया कि संस्थानिक असंवेदनशीलता किस तरह होनहार छात्रों को मौत की ओर धकेल देती है। राज्यसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2018 से 2023 के बीच उच्च शिक्षण संस्थानों में 98 आत्महत्याएं दर्ज की गईं, जिनमें सर्वाधिक मामले आईआईटी और एनआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से सामने आए हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के डराने वाले आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2023 में ही कुल 13,892 छात्रों ने आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठाया।
ये भी पढ़ें मुंबई में 25 बांग्लादेशी नागरिक गिरफ्तार, कोलकाता से दिल्ली, गुजरात के रास्ते पहुंचे थे मुंबईसंगठन ने कड़े शब्दों में आरोप लगाया कि जातिगत भेदभाव और प्रशासनिक लापरवाही इन घटनाओं का प्रमुख कारण हैं। ज्ञापन में जोर दिया गया है कि यूजीसी एक्ट 2026 के लागू होने से शैक्षणिक मानकों में एकरूपता आएगी और प्रशासनिक जवाबदेही तय होगी। राष्ट्रपति से अपील की गई है कि छात्रहित में इस विधेयक को प्राथमिकता के आधार पर लागू कराया जाए ताकि भविष्य में किसी भी छात्र को अपनी अस्मिता और सम्मान के लिए संघर्ष न करना पड़े।
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