मुजफ्फरनगर: 'मां मुझे मोबाइल से बचा लो'.. मासूमों ने माथे पर काली पट्टी बांधकर डिजिटल लत के खिलाफ बुलंद की आवाज
मोबाइल नहीं सपनों को छूना है: गिरधारी लाल जैन मेमोरियल स्कूल के बच्चों ने रैली निकाल कर दिया संदेश; चश्मा, माइग्रेन और चिड़चिड़ेपन जैसी बीमारियों से बचाने की अपील
मुजफ्फरनगर। तकनीक के इस युग में मोबाइल फोन का बढ़ता इस्तेमाल अब मासूम बच्चों के बचपन के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। इसी गंभीर समस्या की ओर समाज का ध्यान खींचने के लिए शहर की सड़कों पर एक अनोखा और भावुक कर देने वाला दृश्य देखने को मिला। हाथों में काले झंडे और माथे पर काली पट्टी बांधकर निकले सैकड़ों स्कूली बच्चों ने किसी व्यक्ति या संस्था का विरोध नहीं किया, बल्कि वे अपने माता-पिता और समाज से खुद को 'डिजिटल गुलामी' से बचाने की गुहार लगा रहे थे। गिरधारी लाल जैन मेमोरियल पब्लिक स्कूल के इन बच्चों ने शहर के प्रमुख चौराहों से गुजरते हुए संदेश दिया कि छोटे हाथों में मोबाइल नहीं, बल्कि किताबें अच्छी लगती हैं।
आसमान में उड़ाई मोबाइल की डमी, जमीन पर दी चेतावनी रैली का शुभारंभ एक प्रतीकात्मक संदेश के साथ हुआ, जहाँ मोबाइल की डमी को गुब्बारों में बांधकर आसमान में उड़ाया गया, जो इस बात का प्रतीक था कि बच्चों को इस लत से मुक्त होकर खुली हवा में सांस लेनी चाहिए। रैली के दौरान मासूम बच्चे हाथों में तख्तियां लिए हुए थे जिन पर लिखा था— 'मां मुझे मोबाइल से बचा लो', 'मोबाइल स्क्रीन नहीं सपनों को छूना है' और 'मोबाइल से दूर रहकर किताबों से नाता जोड़ो'। यह रैली स्कूल परिसर से शुरू होकर प्रेमपुरी, हनुमान चौक, भगत सिंह रोड और शिव चौक होते हुए निकली, जहाँ बच्चों ने दुकानदारों और राहगीरों को मोबाइल के खतरों के प्रति जागरूक किया।
आंखों की रोशनी और बचपन की रौनक पर पड़ रहा असर स्कूल की प्रिंसिपल अलका जैन ने इस मुहिम पर विस्तार से बात करते हुए कहा कि मोबाइल फोन आज केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि एक सामाजिक बीमारी बन चुका है। उन्होंने कहा, "2 साल के बच्चों को खिलौने की तरह मोबाइल दे दिया जाता है, जिससे वे अनजाने में ही इस लत का शिकार हो जाते हैं। इससे बच्चों की याददाश्त कमजोर हो रही है, उन्हें कम उम्र में मोटे चश्मे चढ़ रहे हैं और उनके खेल के मैदान सूने पड़ गए हैं।" उन्होंने माताओं से अपील की कि वे बच्चों को खाना खिलाते समय या व्यस्तता के दौरान बच्चों को मोबाइल न दें, क्योंकि बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने घर में देखते हैं।
छात्रों का दर्द: "हमें बचा लो मोबाइल से" रैली में शामिल छात्र अंशुमन सैनी ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि देर रात तक मोबाइल देखने से उनकी और उनके साथियों की आंखों पर बुरा असर पड़ रहा है। अंशुमन ने कहा, "मोबाइल की वजह से हमें माइग्रेन जैसी बीमारियां हो रही हैं और हम चिड़चिड़े होते जा रहे हैं। हमारा करियर और पढ़ाई इससे प्रभावित हो रही है।" शिक्षकों का मानना है कि मोबाइल छोटे बच्चों के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित होना चाहिए क्योंकि यह समय उनके व्यक्तित्व निर्माण का है। रैली के माध्यम से बच्चों ने भावुक अपील की कि समाज उन्हें इस आभासी दुनिया से बाहर निकालकर वास्तविक बचपन जीने का अवसर प्रदान करे।
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मीडिया और विज्ञापन जगत का 23 वर्षों का लंबा अनुभव रखने वाले रामनिवास कटारिया 'रॉयल बुलेटिन' की व्यावसायिक और संपादकीय टीम के एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। 'अमर उजाला' जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में विज्ञापन प्रभारी के रूप में अपनी सेवाएं देने के बाद, श्री कटारिया पिछले 10 वर्षों से निरंतर रॉयल बुलेटिन परिवार के साथ जुड़े हुए हैं। वर्तमान में विज्ञापन प्रभारी की जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ वे शैक्षणिक संस्थानों (स्कूलों) और औद्योगिक इकाइयों (उद्योगों) की विशेष रिपोर्टिंग भी करते हैं। विज्ञापन संबंधी परामर्श और औद्योगिक/शैक्षणिक खबरों के लिए आप उनसे मोबाइल नंबर 7017986469 पर संपर्क कर सकते हैं।

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