ईरान-अमेरिका तनाव के बीच तेहरान के सहयोगी में हिचकिचाहच, हमले को लेकर विचार कर रहे ट्रंप
वॉशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के खिलाफ सैन्य विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। दरअसल, अमेरिकी अधिकारी कूटनीति को दोनों पक्षों के बीच अंतिम चरण का प्रयास बता रहे हैं। दूसरी ओर ईरान के सबसे करीबी साझेदार, चीन और रूस, अमेरिका के खिलाफ किसी भी संघर्ष में सीधे सैन्य समर्थन देने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। ईरान के खिलाफ कार्रवाई के विकल्पों को लेकर राष्ट्रपति ट्रंप के विचार करने की खबरें काफी समय से सामने आ रही हैं। द वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान कई सालों से चीन और रूस के साथ करीबी सैन्य संबंध बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन दोनों देश आगे बढ़ने में हिचकिचा रहे हैं। इसकी वजह ये है कि सरकार को उस चीज का सामना करना पड़ रहा है जिसे द वॉल स्ट्रीट ने "दशकों में अपने वजूद के लिए सबसे बड़ा अमेरिकी खतरा" बताया है। रूस और ईरान ने पिछले हफ्ते ओमान की खाड़ी में छोटे स्तर पर नौसेना का अभ्यास किया।
ईरानी सरकारी मीडिया ने बताया कि होर्मुज स्ट्रेट में भी चीनी जहाजों के साथ एक एक्सरसाइज की योजना है। फिर भी विश्लेषकों ने जर्नल को बताया कि अगर ट्रंप ईरान पर हमले का आदेश देते हैं तो चीन और रूस ने डायरेक्ट सैन्य मदद देने में बहुत कम दिलचस्पी दिखाई है। इजरायल के एक पूर्व मिलिट्री इंटेलिजेंस अधिकारी डैनी सिट्रिनोविज के हवाले से कहा गया, "वे ईरानी सरकार के लिए अपने फायदे नहीं छोड़ने वाले हैं। उन्हें उम्मीद है कि सरकार नहीं गिरेगी, लेकिन वे निश्चित रूप से सैन्य स्तर पर अमेरिका का मुकाबला नहीं करने वाले हैं।" द न्यूयॉर्क टाइम्स ने रिपोर्ट किया कि ट्रंप ने सलाहकारों से कहा है कि अगर डिप्लोमेसी या किसी शुरुआती टारगेटेड अमेरिकी हमले से ईरान अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम नहीं छोड़ता है, तो वह देश के नेताओं को सत्ता से हटाने के लिए एक बहुत बड़े हमले पर विचार करेंगे। बता दें, अमेरिका और ईरान के बीच जिनेवा में अगले राउंड की बैठक होने वाली है। हालांकि, बातचीत कितनी सफल होती है, ये देखना होगा, लेकिन ट्रंप बातचीत फेल होने पर अमेरिकी कार्रवाई के विकल्पों के बारे में सोच रहे हैं।
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एनवाईटी की रिपोर्ट के मुताबिक जिन टारगेट पर विचार किया जा रहा है, उनमें ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के हेडक्वार्टर से लेकर न्यूक्लियर और बैलिस्टिक मिसाइल फैसिलिटी तक शामिल हैं। ईरान के विदेश मंत्री, अब्बास अराघची ने एक टेलीविजन इंटरव्यू में जोर देकर कहा कि देश न्यूक्लियर नॉनप्रोलिफरेशन ट्रीटी के तहत न्यूक्लियर फ्यूल बनाने के अपने "हक" को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। इस बीच, सीनेटर जेफ मर्कले ने एकतरफा सैन्य कार्रवाई के खिलाफ चेतावनी दी। उन्होंने एक बयान में कहा, "अमेरिकी कांग्रेस की इजाजत के बिना सैन्य कार्रवाई शुरू करने का कोई भी फैसला संविधान का उल्लंघन होगा, चल रही डिप्लोमैटिक कोशिशों को कमजोर करेगा और अमेरिकी सैनिकों और बेगुनाह नागरिकों को क्रॉसफायर में डालने का खतरा होगा।" मर्कले ने आगे कहा, “सिर्फ कांग्रेस के पास जंग का ऐलान करने का कानूनी अधिकार है।”
न्यूयॉर्क पोस्ट में छपे एक अलग इंटरव्यू में, राष्ट्रपति के खास दूत स्टीव विटकॉफ ने कहा कि ईरान को “इंडस्ट्रियल-ग्रेड बम बनाने का सामान” मिलने में “एक हफ्ते का समय” लग सकता है, जिससे व्हाइट हाउस पर कार्रवाई करने का दबाव बढ़ जाएगा। भारत के लिए, होर्मुज स्ट्रेट में किसी भी तरह की बढ़ोतरी के तुरंत नतीजे होंगे। दुनिया की तेल सप्लाई का लगभग पांचवां हिस्सा इसी पतले रास्ते से गुजरता है। रुकावट से दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों और भारत की एनर्जी सिक्योरिटी के लिए जरूरी शिपिंग रूट पर असर पड़ सकता है।
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लेखक के बारे में
मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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