संभल का 'हस्तशिल्प' मिडिल ईस्ट की जंग से बेनूर, 500 करोड़ के कारोबार पर संकट के बादल
निर्यात आर्डर रुकने से कारीगरों के हाथ खाली, खाड़ी देशों में थमी संभली उत्पादों की मांग
संभल। उत्तर प्रदेश के संभल जिले की वैश्विक पहचान बन चुका प्रसिद्ध हैंडीक्राफ्ट उद्योग इन दिनों गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है। मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) के देशों में जारी भीषण युद्ध और बढ़ते तनाव का सीधा प्रहार अब संभल के कारखानों और कार्यशालाओं पर दिखाई देने लगा है। लगभग 500 करोड़ रुपये के सालाना टर्नओवर वाला यह उद्योग विदेशी ऑर्डरों के निरस्त होने और शिपमेंट में देरी के कारण पूरी तरह चरमरा गया है।
संभल की विशिष्ट पहचान यहाँ की हड्डी, सींग और लकड़ी से बने सजावटी सामान, कटलरी हैंडल और कलात्मक बटन हैं। संभल में बनने वाले हैंडिक्राफ्ट आइटम—जैसे हड्डी, सींग और लकड़ी से बने सजावटी सामान, कटलरी हैंडल, बटन और अन्य कलात्मक वस्तुएं कई वर्षों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पहचान बनाए हुए हैं। खासतौर पर दुबई, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और ओमान जैसे देशों में इन हस्तशिल्प उत्पादों की जबरदस्त मांग रहती है। वर्षों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में धाक जमाने वाले इन उत्पादों का निर्यात अब युद्ध की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। समुद्री रास्तों में अनिश्चितता और बढ़ती लॉजिस्टिक्स लागत के कारण विदेशी खरीदारों ने नए सौदों से हाथ खींच लिए हैं। इस युद्ध और बढ़ते तनाव के कारण निर्यात ऑर्डर प्रभावित हो रहे हैं, जिससे कारोबारियों और कारीगरों में चिंता बढ़ गई है।
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संभल का यह उद्योग केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह जिले के हजारों परिवारों की आजीविका का मुख्य आधार है। छोटे-छोटे घरों और लघु इकाइयों में काम करने वाले कारीगर दिन-रात मेहनत कर इन कलाकृतियों को गढ़ते हैं। स्थानीय निर्यातकों का कहना है कि यदि उत्पादन इसी तरह घटता रहा, तो कारीगरों के सामने भुखमरी की नौबत आ जाएगी। निर्यात रुकने का असर केवल व्यापारियों पर ही नहीं, बल्कि पैकिंग, ट्रांसपोर्ट और लेबर जैसे सहायक व्यवसायों पर भी पड़ रहा है।
सरकार से वैकल्पिक बाजार की गुहार
संकट की इस घड़ी में संभल के निर्यातकों और व्यापारिक संगठनों ने सरकार की ओर रुख किया है। उद्यमियों की मांग है कि सरकार उन्हें इस वैश्विक संकट से उबारने के लिए विशेष राहत पैकेज दे और नए अंतरराष्ट्रीय बाजारों (जैसे यूरोप या अमेरिका) तक पहुंच बनाने में मदद करे। निर्यातकों का मानना है कि यदि समय रहते वैकल्पिक बाजार नहीं तलाशे गए, तो संभल की यह पारंपरिक कला दम तोड़ सकती है। जिले की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले इस 500 करोड़ के कारोबार को बचाने के लिए अब सरकारी हस्तक्षेप की दरकार है।
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लेखक के बारे में
अभिषेक भारद्वाज एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें 11 वर्षों से मुरादाबाद मंडल की पत्रकारिता का व्यापक अनुभव है। वे मुरादाबाद के प्रतिष्ठित एसएस न्यूज़ चैनल में संपादकीय प्रभारी जैसे महत्वपूर्ण पद पर कार्य कर चुके हैं। मुरादाबाद की राजनीतिक, सामाजिक और स्थानीय खबरों पर उनकी गहरी पकड़ है। वर्तमान में वे रॉयल बुलेटिन के मुरादाबाद जिला प्रभारी के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

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