मेरठ के सीसीएस विश्वविद्यालय में एआई, साइबर सुरक्षा और सिमुलेशन पर अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला संपन्न
मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के गणित विभाग में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन, नई दिल्ली के सहयोग से आयोजित अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला अत्यंत सार्थक एवं शोधकेंद्रित रही। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, फज़ी अनुकूलन, साइबर सुरक्षा और सिमुलेशन जैसे आधुनिक वैज्ञानिक क्षेत्रों में हो रहे वैश्विक परिवर्तन और चुनौतियों पर विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए।
कार्यशाला का शुभारंभ प्रोफेसर अरविंद यादव द्वारा सांकेतिकी के महत्व पर केंद्रित व्याख्यान से हुआ। उन्होंने बताया कि डिजिटल संचार में सुरक्षा की पहली और सबसे मज़बूत दीवार सांकेतिकी ही है। बढ़ते हुए साइबर खतरों और परम संगणन तकनीक के आगमन पर उन्होंने विशेष चिंता जताई और भविष्य की सांकेतिक प्रणालियों को अधिक सक्षम बनाने की आवश्यकता बताई।
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रक्षा अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. संजय कुमार ने प्रत्यावर्ती डेटा छिपाने की आधुनिक तकनीक को विस्तार से समझाया और बताया कि यह विधि बिना किसी क्षति के डिजिटल सूचना को सुरक्षित पुनः प्राप्त करने की क्षमता रखती है, जो आने वाले वर्षों में सुरक्षा तंत्र की अभिन्न आवश्यकता बनेगी।
इसके बाद डॉ. सुमित कुमार ने मोबाइल उपकरणों पर मंडराते खतरों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आज सबसे अधिक संवेदनशील और निशाने पर रहने वाला उपकरण आम आदमी का मोबाइल फ़ोन है। इसलिए बहुआयामी सुरक्षा विश्लेषण अपनाना समय की मांग है।
संयुक्त अरब अमीरात से आए प्रोफेसर संजय कुमार त्यागी ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता को शोध का सहयात्री बताते हुए कहा कि अब यह तकनीक केवल निर्देशों पर चलने वाली मशीन नहीं, बल्कि वैज्ञानिक खोजों को गति देने वाला साझेदार बन चुकी है। विशाल आंकड़ों में छिपे सत्य को उजागर करने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।
अंतिम सत्र में अमेरिका से जुड़ी विशेषज्ञ मनस्विता त्यागी ने इस बात पर जोर दिया कि सुरक्षा प्रणालियों की बुद्धिमत्ता तभी सार्थक है जब वह अपने निर्णयों के आधार स्पष्ट कर सके। उन्होंने इसे भविष्य की विश्वसनीय और पारदर्शी साइबर सुरक्षा प्रणाली का आधार बताया।
इस अवसर पर गणित विभागाध्यक्ष एवं कार्यक्रम संयोजक प्रोफेसर मुकेश कुमार शर्मा ने कहा—“विश्व तेजी से डिजिटल और डेटा केंद्रित हो रहा है। ऐसे में हमारा लक्ष्य है कि शोधार्थियों और विद्यार्थियों को उन उन्नत प्रौद्योगिकियों का ज्ञान दिया जाए जो देश की साइबर सुरक्षा, रक्षा और वैज्ञानिक विकास में निर्णायक भूमिका निभाएँगी। यह कार्यशाला केवल ज्ञान का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि शोध में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।”
उन्होंने यह भी बताया कि प्रतिभागियों की सक्रियता और विशेषज्ञों के मार्गदर्शन से यह आयोजन अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल होता दिखाई दे रहा है।
कार्यशाला में लगभग सत्तर प्रतिभागियों की उपस्थिति रही और शोधार्थियों ने उत्साहपूर्वक वैज्ञानिक चर्चाओं में योगदान दिया।
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