नीति आयोग की राष्ट्रीय कार्यशाला में हुआ प्राकृतिक कृषि पर मंथन, किसानों की आय बढ़ाने और मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार पर बल
खेती में नई क्रांति:देशभर के किसानों के लिए जारी हुई 'प्रशिक्षण नियमावली'
नई दिल्ली। देश में कृषि प्रणालियों को अधिक टिकाऊ और किसान-केंद्रित बनाने के उद्देश्य से नीति आयोग ने राष्ट्रीय कार्यशाला में देशभर के किसानों, वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और स्टार्टअप्स ने एक मंच पर आकर प्राकृतिक खेती को जन-आंदोलन बनाने की रणनीति पर चर्चा की।
नीति आयोग द्वारा नई दिल्ली में आयोजित इस दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में अपने राज्य सहायता मिशन (एसएसएम) के तहत प्राकृतिक खेती पर प्राकृतिक कृषि पर मंथन किया। राष्ट्रीय कार्यशाला में देशभर से किसानों, नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों, स्टार्टअप और नागरिकों ने एक मंच पर भागीदारी की। इस कार्यशाला के दौरान प्राकृतिक खेती पर हिंदी और अंग्रेजी में प्रशिक्षण नियमावली की शुरुआत की गई, जिसका उद्देश्य किसानों, विस्तार अधिकारियों और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को प्राकृतिक खेती पद्धतियों पर क्षेत्र-प्रासंगिक और व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करना है।
प्रशिक्षण नियमावली का विमोचन
कार्यशाला का एक मुख्य आकर्षण प्राकृतिक खेती पर हिंदी और अंग्रेजी में तैयार की गई प्रशिक्षण नियमावली की शुरुआत रही। इसका उद्देश्य जमीनी स्तर के विस्तार अधिकारियों और किसानों को व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करना है, ताकि वे वैज्ञानिक तरीके से प्राकृतिक पद्धतियों को अपना सकें।
राज्यपाल आचार्य देवव्रत का वर्चुअल संबोधन
गुजरात और महाराष्ट्र के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने वर्चुअल माध्यम से प्रतिभागियों को संबोधित किया। उन्होंने मिट्टी के गिरते स्वास्थ्य पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि प्राकृतिक खेती न केवल खेती की लागत कम करती है, बल्कि यह किसानों की आय बढ़ाने और उपभोक्ताओं को जहर मुक्त भोजन उपलब्ध कराने का एकमात्र प्रभावी विकल्प है।उन्होंने टिकाऊ, किसान-केंद्रित कृषि प्रणालियों के महत्व और मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार, इनपुट लागत को कम करने और किसानों की आय बढ़ाने में प्राकृतिक खेती की भूमिका पर जोर दिया।
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कार्यशाला में खासतौर पर पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल और ओडिशा के किसानों, कृषि अधिकारियों और कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) के वैज्ञानिकों ने प्राकृतिक खेती पर विचार-विमर्श किया। इस कार्यक्रम में जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय, डॉ. वाईएस परमार बागवानी और वानिकी विश्वविद्यालय और गुजरात प्राकृतिक कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय सहित प्रमुख शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों की सक्रिय भागीदारी रही। वहीं केंद्रीय विभाग के नाबार्ड, एपीडा और सहकारिता मंत्रालय के अधिकारियों ने प्रमाणीकरण और बाजार संबंधों पर विशेष जोर दिया।
770 प्रतिभागियों के बीच खुली चर्चा
कार्यशाला के पहले दिन आयोजित ओपन सेशन में 770 प्रतिभागियों ने भाग लिया। इस दौरान प्रमाणीकरण और बाजार की उपलब्धता जैसी चुनौतियों पर खुलकर बात हुई। सभी विशेषज्ञों ने इस बात पर सहमति जताई कि प्राकृतिक खेती की सफलता के लिए 'किसान नेतृत्व मॉडल' का होना आवश्यक है। पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल और ओडिशा के किसानों, कृषि अधिकारियों और कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) के वैज्ञानिकों ने प्राकृतिक खेती पर विचार-विमर्श किया। इसके अलावा एपीडा, नाबार्ड, सहकारिता मंत्रालय, पशुपालन और दुग्ध उत्पादन विभाग (डीएएचडी), पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान सहित प्रमुख केंद्रीय संस्थानों और मंत्रालयों के अधिकारियों ने भी कार्यशाला में भाग लिया।
जमीनी अवलोकन और तकनीक का प्रदर्शन
कार्यशाला के दूसरे दिन प्रतिभागियों को जमीनी स्तर पर प्राकृतिक कृषि पद्धतियों का अवलोकन करने और विशेषज्ञों से बातचीत करने का अवसर मिला। इस दौरान विभिन्न विदेशी फसलों के लिए प्राकृतिक कृषि पद्धतियों के साथ-साथ खेत में और स्वचालन प्रणाली के माध्यम से जैव-उपकरणों की तैयारी को दर्शाया गया। स्टार्टअप्स और किसान उत्पादक संगठनों ने इस बढ़ते इको-सिस्टम को और मजबूत करने का संकल्प लिया।
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लेखक के बारे में
ओ.पी. पाल पिछले साढ़े तीन दशकों से पत्रकारिता में सक्रिय एक प्रतिष्ठित नाम हैं। भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त (P.I.B. Accredited) वरिष्ठ पत्रकार श्री पाल ने लंबे समय तक लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही के साथ-साथ गृह, रक्षा और कृषि जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की नेशनल ब्यूरो स्तर पर रिपोर्टिंग की है।
अमर उजाला और दैनिक जागरण से पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले श्री पाल ने 'शाह टाइम्स' में न्यूज़ एडिटर और 'हरिभूमि' (दिल्ली) में वरिष्ठ संवाददाता के रूप में लंबी सेवाएं दी हैं। राजनीति विज्ञान और कृषि के विशेषज्ञ होने के साथ-साथ वे 'साहित्य रत्न' से भी विभूषित हैं। वर्तमान में वे एक स्वतंत्र पत्रकार और स्तंभकार के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

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